भारतीय Gen Z (जनरेशन Z) के खर्च करने के तरीके में बड़ा बदलाव आया है। जहां पहले उन्हें घूमने-फिरने का शौक रखने वाली पीढ़ी माना जाता था, वहीं अब वे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा बिल और सब्सक्रिप्शन पर खर्च कर रहे हैं। एक नई स्टडी के अनुसार, भारतीय Gen Z अपनी मासिक आय का **20.1%** बिल और सब्सक्रिप्शन पर खर्च करते हैं, जबकि यात्रा पर केवल **5%** ही खर्च होता है।
क्यों बदल रहे हैं Gen Z के खर्चे?
SalarySe की एक स्टडी, जिसमें लाखों UPI ट्रांजैक्शन का विश्लेषण किया गया है, बताती है कि अब बिल और सब्सक्रिप्शन, भारतीय Gen Z के लिए खर्च की सबसे बड़ी कैटेगरी बन गई है। यह ट्रेंड बताता है कि यह पीढ़ी अब अपनी लाइफस्टाइल से ज्यादा रोजमर्रा की जरूरी चीजों और सेवाओं पर ध्यान दे रही है।
जरूरी खर्चे पहले, मजे बाद में
स्टडी के मुताबिक, Gen Z की सैलरी का 70% से ज्यादा हिस्सा पांच मुख्य चीजों पर खर्च होता है:
- बिल और सब्सक्रिप्शन: 20.1%
- किराना (Groceries): 15.7%
- फाइनेंशियल सर्विसेज (Financial Services): 12.2%
- खरीदारी (Shopping): 11.9%
- खाना (Food): 11.5%
यह पैटर्न दिखाता है कि डिजिटल सुविधाएँ और रेगुलर खर्च उनके जीवन का अहम हिस्सा बन गए हैं। यात्रा, जिसे अक्सर इस उम्र के लोगों की पहली पसंद माना जाता है, अब उनके मासिक बजट का केवल 5% ही है। निवेशकों के लिए यह एक अहम संकेत है कि कंज्यूमर की आदतें बदल रही हैं और अब लोग घूमने-फिरने से ज्यादा जरूरी और भरोसेमंद सेवाओं पर पैसा खर्च कर रहे हैं, जैसे कि डिजिटल प्लेटफॉर्म, फाइनेंशियल यूटिलिटी और सब्सक्रिप्शन-आधारित कंटेंट।
स्ट्रीमिंग और सब्सक्रिप्शन का जलवा
सब्सक्रिप्शन सेवाओं की बढ़ती लोकप्रियता इस खर्च के पैटर्न में बड़ी भूमिका निभा रही है। मनोरंजन प्लेटफॉर्म्स में, JioHotstar 12.4% सब्सक्रिप्शन बजट के साथ सबसे आगे है, जिसके बाद Netflix (10.7%) और Spotify (5.6%) का नंबर आता है।
यह स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के लिए एक स्टिकी रेवेन्यू मॉडल बनाता है, लेकिन इसमें एक नया रिस्क भी है। छोटे-छोटे ऑटो-डेबिट पेमेंट जमा होकर युवा के बजट पर एक बड़ा फिक्स्ड कॉस्ट बन जाते हैं। हालांकि इससे मीडिया कंपनियों को लगातार कमाई होती है, लेकिन अगर इन सब्सक्रिप्शन्स के दाम बढ़ते हैं तो वे कीमतों के प्रति बहुत संवेदनशील हो सकते हैं। अगर महंगाई बढ़ती है या रहने की लागत बढ़ती है, तो ये 'जरूरी' डिजिटल सब्सक्रिप्शन भी लागत-जागरूक उपभोक्ताओं द्वारा छांट दिए जा सकते हैं।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
यह डेटा बताता है कि जो कंपनियां Gen Z के रोजमर्रा के वित्तीय जीवन में अपनी जगह बना रही हैं - चाहे वह UPI पेमेंट हो, सब्सक्रिप्शन मॉडल हो या जरूरी सेवाएं देना हो - उन्हें एक स्थिर कस्टमर बेस मिल सकता है।
लेकिन एक सीमा है - उपभोक्ता का बटुआ सीमित है। जैसे-जैसे ज्यादा डिजिटल सेवाएं उसी मंथली बजट के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी, निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां प्राइसिंग पावर और यूजर चर्न (ग्राहक टूटना) को कैसे मैनेज करती हैं। लंबे समय तक ग्रोथ के लिए यह देखना अहम होगा कि स्ट्रीमिंग और फाइनेंशियल सर्विस फर्म 'ऑप्शनल' की बजाय 'जरूरी' बनी रहती हैं या नहीं। इसके अलावा, ऑटो-डेबिट पेमेंट पर बढ़ती निर्भरता यह भी बताती है कि अगर डिस्पोजेबल इनकम में कोई बड़ी रुकावट आती है, तो लोग मनोरंजन सब्सक्रिप्शन की जगह किराना और यूटिलिटीज जैसी जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए तेजी से इन्हें कैंसिल कर सकते हैं।
