भारतीय परिवारों के खरीदारी के तौर-तरीके पूरी तरह बदल गए हैं। FMCG पर खर्च **10%** बढ़ गया है, जबकि दुकानों पर जाने की फ्रीक्वेंसी में गिरावट आई है। यह बदलाव प्रीमियम प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ते झुकाव का संकेत है।
भारतीय घरों में रोजमर्रा की जरूरतों (FMCG) को खरीदने का तरीका अब बदल रहा है। पिछले एक साल में कुल खर्च में 10% की वृद्धि हुई है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि दुकानों पर जाने की संख्या कम हो गई है। इसका मतलब है कि उपभोक्ता कम लेकिन बड़े और प्रीमियम प्रोडक्ट्स खरीद रहे हैं।
'प्रीमियम' पर दांव
यह ट्रेंड 'प्रीमियमाइजेशन' (Premiumization) की ओर इशारा करता है। लोग अब छोटी सैशे (sachets) के बजाय बड़ी बोतलें या ज्यादा वैल्यू वाले पैक खरीदना पसंद कर रहे हैं। चाहे वो पर्सनल केयर हो या स्नैक्स, प्रीमियम और बेहतर क्वालिटी वाले प्रोडक्ट्स की डिमांड तेजी से बढ़ी है।
निवेशकों के लिए सबक
पुराने समय में किसी भी FMCG कंपनी की ताकत उसकी डिस्ट्रिब्यूशन पहुंच (distribution moat) पर निर्भर करती थी, लेकिन अब यह समीकरण बदल रहा है। अब कंपनियां डिजिटल और क्विक-कॉमर्स (quick-commerce) चैनलों पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, क्योंकि यहीं से लोग बड़े ऑर्डर्स दे रहे हैं।
चुनौतियां और जोखिम
हालांकि 10% की ग्रोथ सेक्टर के लिए पॉजिटिव है, लेकिन कंपनियां मार्जिन दबाव का सामना कर रही हैं। इनपुट कॉस्ट और फ्रेट की अस्थिरता कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित कर रही है। साथ ही, डिजिटल-फर्स्ट ब्रांड्स और प्राइवेट लेबल्स की बढ़ती प्रतियोगिता से पुरानी और बड़ी कंपनियों को अपनी मार्केट शेयर बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। अब निवेशकों को सिर्फ दुकानों की संख्या नहीं, बल्कि 'शेयर ऑफ बास्केट' (Share of Basket) पर नजर रखनी होगी, जो यह बताती है कि एक कस्टमर के टोटल शॉपिंग बिल में कंपनी के प्रोडक्ट्स का कितना योगदान है।
