ग्लोबल मार्केट से मिले चिंताजनक संकेतों और लगातार बनी हुई महंगाई की मार के चलते, भारतीय उपभोक्ता का खर्च करने का तरीका बदल गया है। साल 2026 की शुरुआत में, लोग जहां खाने-पीने और रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों पर ज़्यादा खर्च कर रहे हैं, वहीं घर और पर्सनल केयर जैसे 'डिस्क्रिशनरी' यानी ऐच्छिक सामानों पर खर्च कम कर रहे हैं।
Bizom डेटा के मुताबिक, FMCG सेक्टर की वैल्यू ग्रोथ दिसंबर 2025 में 9.5% थी, जो जनवरी 2026 में गिरकर 5.7% और फरवरी 2026 में 5.5% पर आ गई। यह मंदी खास तौर पर होम केयर (Home Care) और पर्सनल केयर (Personal Care) सेगमेंट में देखी गई, जहां ग्रोथ लगभग 3% और 3.6% से 4.3% तक सिमट गई।
इसके उलट, डेरी प्रोडक्ट्स (Dairy Products) की डिमांड फरवरी में 11.7% उछली, जबकि पैक्ड फूड्स (Packaged Foods) 12.6% की ज़बरदस्त ग्रोथ के साथ आगे बढ़े। बेवरेजेज़ (Beverages) सेगमेंट ने भी 10% से ज़्यादा की ग्रोथ बरकरार रखी।
यह धीमी रफ़्तार खास तौर पर शहरी इलाकों में ज़्यादा महसूस की गई। जनवरी में शहरी FMCG वैल्यू ग्रोथ सिर्फ 2.2% और फरवरी में 3.9% रही, जो दिसंबर के 6.5% से काफी कम है। हालांकि, ग्रामीण (Rural) इलाकों में डिमांड में ज़्यादा लचीलापन (resilience) दिखा, जहाँ ग्रोथ इसी दौरान 7.7% और 6.5% दर्ज की गई। सरकारी पहलों (initiatives) ने यहाँ खपत को सहारा दिया है।
इस स्थिति की जड़ें वेस्ट एशिया (West Asia) में बढ़ते संकट और भू-राजनीतिक (geopolitical) तनाव में हैं। मार्च 2026 तक क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतें $114-$115 प्रति बैरल तक पहुँच गईं। भारत, जो अपनी 88.6% ज़रूरत के लिए क्रूड ऑयल आयात (import) करता है, इस बढ़ोतरी से सीधे तौर पर प्रभावित होता है। यह महंगाई को और बढ़ा सकता है और चालू खाते (current account) के घाटे को बढ़ा सकता है।
साथ ही, ज़रूरी सामानों की लगातार बढ़ती कीमतें, EMI और किराए का बढ़ता बोझ, शहरी मध्यम वर्ग के डिस्पोजेबल इनकम (disposable income) को निचोड़ रहा है, जिससे वे ऐच्छिक खरीदारी से कतरा रहे हैं। जनवरी 2026 में CPI इन्फ्लेशन 2.75% पर था, जो RBI के लक्ष्य बैंड में है, लेकिन इसी महीने होलसेल इन्फ्लेशन (Wholesale Inflation) 9 महीने के उच्च स्तर 1.81% पर पहुँच गया।
इन चुनौतियों के बावजूद, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स साल 2026 के लिए FMCG सेक्टर को लेकर 'सावधानी भरा आशावाद' (cautiously optimistic) जता रहे हैं। इनपुट कॉस्ट (input cost) के स्थिर होने, शहरी डिमांड में धीरे-धीरे सुधार और ग्रामीण बाज़ारों की मजबूती से हाई सिंगल-डिजिट वॉल्यूम ग्रोथ (high single-digit volume growth) की उम्मीद है। RBI द्वारा फरवरी 2026 में रेपो रेट (repo rate) को 5.25% पर स्थिर रखना भी एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव एक बड़ा जोखिम बने रहेंगे, जो उपभोक्ता के भरोसे और डिमांड रिकवरी को प्रभावित कर सकते हैं।