भारत की कैफे चेन्स (Cafe Chains) मुश्किल में हैं! प्रीमियम इम्पोर्टेड सामग्री, जैसे कि Matcha, के दाम **30%** से लेकर **75%** तक बढ़ गए हैं। हालाँकि हाई-एंड ड्रिंक्स की डिमांड (Demand) अभी भी मजबूत है, लेकिन कई बड़े ब्रांड्स ये बढ़े हुए दाम खुद झेल रहे हैं, जिससे उनके मुनाफे (Profit Margins) पर दबाव आ रहा है।
इम्पोर्टेड लागत में भारी उछाल
आजकल की मॉडर्न कैफे चेन्स के लिए Matcha, Hojicha, और Yuzu जैसी प्रीमियम इम्पोर्टेड चीज़ें उनके बिजनेस का अहम हिस्सा बन गई हैं। लेकिन पिछले एक साल में, खासकर जापान में खराब फसल, लेबर की कमी और बढ़े हुए शिपिंग खर्चों के कारण, सेरेमोनियल-ग्रेड Matcha की कीमत 75% तक बढ़ गई है। वहीं, लोअर-ग्रेड Matcha के दाम 30% से 50% तक ऊपर गए हैं। इतना ही नहीं, कॉफी और व्हे (Whey) जैसे ज़रूरी इनपुट्स (Inputs) की कीमतें भी लगभग 20% तक बढ़ी हैं। सप्लाई चेन (Supply Chain) में दिक्कतें और कमजोर होते रुपये ने इन इम्पोर्ट्स को भारतीय ऑपरेटर्स के लिए और भी महंगा बना दिया है।
मुनाफे पर सीधा असर
ज़्यादातर बड़ी कैफे चेन्स अभी इन बढ़ी हुई लागतों को ग्राहकों से वसूलने के बजाय खुद झेल रही हैं। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि कॉम्पिटिशन (Competition) वाले मार्केट में ग्राहकों की आवाजाही बनी रहे। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ है कि जिन ड्रिंक्स में ये इम्पोर्टेड सामग्री इस्तेमाल होती है, उनके ग्रॉस मार्जिन (Gross Margin) में करीब 2% की कमी आई है। वैसे भी, Matcha Lattes और Bubble Teas जैसी प्रीमियम ड्रिंक्स की कीमत ₹250 से ₹450 के बीच होती है, इसलिए कंपनियाँ एवरेज ऑर्डर वैल्यू (Average Order Value) बढ़ाने और मार्जिन कम होने के रिस्क के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं।
छोटे और बड़े प्लेयर्स में अंतर
यह लागत का दबाव हर कंपनी पर एक जैसा नहीं है। बड़ी और अच्छी फंडिंग वाली कैफे चेन्स के पास बेहतर प्रोक्योरमेंट (Procurement) की शर्तें तय करने या महंगाई के असर को टालने की क्षमता होती है। इसके उलट, छोटे कैफे ऑपरेटर्स के पास इतने पैसे नहीं होते कि वे इस तरह के बड़े खर्चे खुद झेल सकें। ऐसे में, उन्हें ये दाम ग्राहकों पर डालने पड़ सकते हैं, जिससे उनकी कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) पर असर पड़ेगा।
भविष्य की रणनीति और विकल्प
भारत में स्पेशल टी (Speciality Tea) और बबल टी (Bubble Tea) मार्केट तेज़ी से बढ़ रहा है, जहाँ अकेले बबल टी मार्केट का वैल्यू लगभग ₹3,800 करोड़ है। इस रिस्क से बचने के लिए, कुछ डोमेस्टिक (Domestic) ब्रांड्स भारत में ही उगाई जाने वाली Matcha और Hojicha को इस्तेमाल करने की सोच रहे हैं। दार्जिलिंग (Darjeeling) और नीलगिरि (Nilgiris) जैसे इलाकों में थोड़ी-बहुत खेती हो रही है, लेकिन अभी हाई-क्वालिटी Matcha का कमर्शियल प्रोडक्शन (Commercial Production) भारत में पूरी तरह से सेट नहीं हुआ है। अब देखना यह है कि कंपनियाँ क्वालिटी से समझौता किए बिना डोमेस्टिक सामग्री पर शिफ्ट कर पाती हैं या नहीं, या फिर इम्पोर्ट की बढ़ती कीमतों के चलते उन्हें दाम बढ़ाने ही पड़ेंगे।
