त्योहारी सीजन में भारतीय अपैरल रिटेलर्स को **12-13%** रेवेन्यू ग्रोथ की उम्मीद है। हालांकि, बढ़ती लागत और **15 अक्टूबर** से लागू होने वाले नए UPI ट्रांजैक्शन फीस के कारण ऑपरेटिंग मार्जिन में **100 बेसिस पॉइंट्स** की गिरावट का खतरा बना हुआ है।
त्योहारी सीजन भारतीय रिटेल सेक्टर के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है, जो कुल वार्षिक बिक्री का 35% से 40% हिस्सा कवर करता है। इस बार कंपनियां 12-13% रेवेन्यू ग्रोथ का लक्ष्य लेकर चल रही हैं, खासकर टियर-II और टियर-III शहरों में मांग काफी मजबूत है। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे कुछ बड़ी चुनौतियां भी खड़ी हैं।\n\n### मार्जिन पर दबाव और लागत का बोझ\n\nत्योहारी जोश के बीच, कंपनियों के लिए ऑपरेटिंग मार्जिन को बचाना मुश्किल हो रहा है। मार्जिन में करीब 100 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट के साथ यह 14% के स्तर पर रहने की आशंका है। इसकी बड़ी वजह कपास (Cotton) जैसी कच्ची सामग्रियों की बढ़ती कीमतें और लॉजिस्टिक्स का महंगा होना है। इसके अलावा, खाने-पीने की चीजों में महंगाई (Food Inflation) के कारण ग्राहकों के बजट पर असर पड़ा है, जिससे वे कपड़ों पर खर्च करने से पहले सोच-विचार कर रहे हैं।\n\n### नए UPI नियम और चुनौतियां\n\nरिटेलर्स के लिए एक और बड़ी मुसीबत 15 अक्टूबर, 2026 से शुरू होने जा रही है। अब ₹2,000 से ज्यादा के UPI ट्रांजैक्शन पर 0.4% का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगेगा। रिटेलर्स के सामने दुविधा यह है कि क्या वे इस अतिरिक्त लागत को खुद वहन करें या फिर इसे ग्राहकों पर डालें। यदि वे इसे ग्राहकों पर डालते हैं, तो उन्हें दाम बढ़ाने पड़ेंगे या फिर फेस्टिव डिस्काउंट में कटौती करनी होगी।\n\nफिलहाल, रिटेलर्स 'वैल्यू-फैशन' पर दांव लगा रहे हैं, जिसका हिस्सा कुल सेगमेंट रेवेन्यू में बढ़कर 46% हो गया है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि कंपनियां इन कॉस्ट-प्रेशर के बीच अपनी प्रॉफिटेबिलिटी को कैसे सुरक्षित रखती हैं।
