साल 2025 में भारत का अल्कोहल मार्केट **₹6.18 लाख करोड़** के वैल्यूएशन पर पहुंच गया है। जहां प्रीमियम ड्रिंक्स की बढ़ती डिमांड कमाई बढ़ा रही है, वहीं टैक्स के झंझट और आयातित शराब से बढ़ता कॉम्पिटिशन कंपनियों के लिए चुनौती बना हुआ है।
भारतीय शराब बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कंज्यूमर्स अब सामान्य शराब के बजाय प्रीमियम व्हिस्की, जिन और सिंगल माल्ट जैसे प्रोडक्ट्स की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। कंपनियां भी अब 'प्रेसटिज-एंड-अबव' कैटेगरी पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, क्योंकि इसमें मास-मार्केट के मुकाबले बेहतर प्रॉफिट मार्जिन मिलता है।
इंडिया-यूके ट्रेड डील का असर
जुलाई 2026 से लागू हुए 'इंडिया-यूके ट्रेड एग्रीमेंट' ने गेम पूरी तरह बदल दिया है। यूके से आने वाली स्कॉच व्हिस्की पर कस्टम ड्यूटी 150% से घटकर 75% रह गई है। इसके चलते रिटेल कीमतों में 7% से 10% तक की गिरावट देखी गई है। अब घरेलू प्रीमियम ब्रांड्स के सामने ग्लोबल दिग्गजों को टक्कर देने और अपना मार्केट शेयर बचाने की बड़ी चुनौती है।
राज्यों के नियम और टैक्स का पेंच
शराब पर राज्यों के अलग-अलग नियम और टैक्स स्ट्रक्चर कंपनियों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। फिलहाल कोई नेशनल प्राइसिंग फार्मूला नहीं होने से कंपनियां खुलकर कीमतें नहीं तय कर सकतीं। हालांकि, कर्नाटक का उदाहरण उम्मीद जगाता है, जहां साल 2026 की शुरुआत में 'अल्कोहल-इन-बेवरेज' टैक्स मॉडल अपनाने से एक्साइज कलेक्शन और बीयर वॉल्यूम में जोरदार उछाल आया है।
रेगुलेटरी दबाव और फ्यूचर आउटलुक
FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) ने भी रेगुलेटरी सख्ती बढ़ा दी है। अब कंपनियों को पैकेजिंग, इंग्रीडिएंट्स और मैचुरेशन प्रोसेस की स्पष्ट जानकारी देना अनिवार्य है, जिससे ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ रही है। निवेशकों के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कंपनियां अपनी प्रॉफिटेबिलिटी को बरकरार रखते हुए इस कठिन बाजार में खुद को साबित कर पाएंगी?
