भारत-UK ट्रेड डील के बावजूद, भारतीय अधिकारी अब बल्क स्कॉच व्हिस्की के क्लासिफिकेशन पर सवाल उठा रहे हैं। अगर ड्यूटी **150%** पर बरकरार रही, तो Diageo, Pernod Ricard और Radico Khaitan जैसी बड़ी कंपनियों के मार्जिन पर भारी दबाव पड़ सकता है।
जुलाई 2026 में लागू हुई भारत-UK फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के बाद शराब उद्योग के सामने एक नया ट्रेड विवाद खड़ा हो गया है। इस डील के तहत स्कॉच व्हिस्की पर इंपोर्ट टैरिफ को 150% से घटाकर 75% किया जाना था, लेकिन भारतीय कस्टम्स विभाग ने अब बल्क व्हिस्की के क्लासिफिकेशन पर ही सवाल उठा दिए हैं।
विवाद की जड़ क्या है?
कस्टम्स अधिकारियों का तर्क है कि ये बल्क शिपमेंट्स 'फिनिश्ड स्कॉच व्हिस्की' की श्रेणी में नहीं आते, बल्कि इन्हें 'कंपाउंड अल्कोहलिक प्रिपरेशंस' माना जाना चाहिए। यदि यह वर्गीकरण लागू रहता है, तो ड्यूटी 150% ही बनी रहेगी, जिससे ट्रेड डील का लाभ पूरी तरह खत्म हो जाएगा। गौरतलब है कि भारत में आयात होने वाली कुल स्कॉच व्हिस्की का लगभग 80% हिस्सा बल्क में आता है, जिसे स्थानीय स्तर पर ब्लेंड और बॉटल किया जाता है।
बड़ी कंपनियों पर असर
Diageo, Pernod Ricard, Allied Blenders and Distillers और Radico Khaitan जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए यह एक बड़ी मुसीबत है। ये कंपनियां बल्क माल्ट स्पिरिट्स आयात करती हैं और उन्हें स्थानीय अनाज स्पिरिट्स के साथ मिलाकर बाजार में उतारती हैं। ड्यूटी लागत बढ़ने से इन कंपनियों के मार्जिन पर तगड़ा असर पड़ सकता है, क्योंकि भारत के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार में ग्राहकों पर अतिरिक्त बोझ डालना आसान नहीं होगा।
रेगुलेटरी जांच का दायरा
मामला सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं है। डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI) ने ड्यूटी क्लासिफिकेशन में गड़बड़ी की आशंका के चलते कई दिग्गज शराब कंपनियों के दफ्तरों पर सर्च भी किया है। यह कानूनी जोखिम शेयरधारकों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
आगे की राह
ISWAI और CIABC जैसे इंडस्ट्री बॉडीज इस मसले को सुलझाने की कोशिश में जुटे हैं। उनका कहना है कि इस अनिश्चितता से 'मेक इन इंडिया' प्रयासों को धक्का लग सकता है। अब निवेशकों की नजर 2 नवंबर, 2026 को होने वाली वाणिज्य मंत्रालय और इंडस्ट्री दिग्गजों की हाई-लेवल बैठक पर है। इस बैठक का नतीजा ही तय करेगा कि कंपनियों का फाइनेंशियल ईयर कैसा रहेगा।
