रसोई तेल की पैकेजिंग पर सरकार का बड़ा कदम! 'श्रिंकफ्लेशन' पर लगेगी लगाम, तय होंगे स्टैंडर्ड साइज

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
रसोई तेल की पैकेजिंग पर सरकार का बड़ा कदम! 'श्रिंकफ्लेशन' पर लगेगी लगाम, तय होंगे स्टैंडर्ड साइज
Overview

सरकार अब रसोई तेल की पैकेजिंग के लिए स्टैंडर्ड साइज जैसे **1 लीटर** और **5 लीटर** तय करने की तैयारी में है। इसका मुख्य मकसद 'श्रिंकफ्लेशन' (Shrinkflation) को रोकना है, ताकि ग्राहकों को कीमतों की तुलना करने में आसानी हो और कन्फ्यूजन कम हो। इस कदम को एडिबल ऑयल इंडस्ट्री के बड़े समूहों का भी समर्थन मिला है।

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श्रिंकफ्लेशन पर नकेल कसने के लिए भारत का बड़ा कदम: स्टैंडर्ड पैकेजिंग पर विचार

उपभोक्ता मामले विभाग (Department of Consumer Affairs) एडिबल ऑयल के लिए स्टैंडर्ड पैकेजिंग साइज को फिर से लागू करने की नीति की समीक्षा कर रहा है। यह कदम 2022 में फ्लेक्सिबल नियमों के आने के बाद उठाया जा रहा है, जिससे 650 ग्राम, 850 ग्राम, और 870 ग्राम जैसे नॉन-स्टैंडर्ड पैक साइज में बढ़ोतरी देखी गई थी। इंडस्ट्री एसोसिएशन, जो एडिबल ऑयल मार्केट का लगभग 90% प्रतिनिधित्व करते हैं, का मानना है कि ये अलग-अलग साइज 'श्रिंकफ्लेशन' को बढ़ावा देते हैं, जहाँ ग्राहकों को कम उत्पाद के लिए वही कीमत चुकानी पड़ती है। सरकार ने 200ml, 500ml, 1L, 2L, 3L, 4L, 5L जैसे फिक्स्ड साइज और 15L/20L के बल्क ऑप्शन का प्रस्ताव दिया है, ताकि ग्राहकों को लागत की तुलना करने में आसानी हो।

फ्लेक्सिबल नियमों से सख्त लागू करने की ओर

2021 और 2022 में पहले के नियमों ने यूनिट सेल प्राइस (unit sale price) की घोषणा पर निर्भर रहते हुए मैंडेटरी फिक्स्ड पैक क्वांटिटीज को हटा दिया था। हालांकि, इंडस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि ग्राहक आमतौर पर यूनिट प्राइसिंग के बजाय पैकेजिंग की एब्सोल्यूट प्राइस (absolute price) और विज़ुअल अपीयरेंस पर ज्यादा ध्यान देते हैं। कंपनियों ने ग्लोबल कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण घटते प्रॉफिट मार्जिन को मैनेज करने के लिए नॉन-स्टैंडर्ड साइज का इस्तेमाल किया है, क्योंकि पैकेजिंग की लागत मैन्युफैक्चरिंग खर्च का 15% तक हो सकती है। प्रस्तावित बदलाव के लिए मैन्युफैक्चरर्स को अपने फिलिंग इक्विपमेंट को एडजस्ट करना होगा, और मौजूदा स्टॉक को क्लियर करने के लिए संभावित तीन महीने की ट्रांजीशन पीरियड पर चर्चा की जा रही है।

कंपनियों के लिए प्रोडक्शन चुनौतियां

हालांकि इंडस्ट्री आम तौर पर निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के लिए मानकीकरण का समर्थन करती है, लेकिन नीति में बदलाव से तत्काल ऑपरेशनल मुद्दे खड़े हो रहे हैं। Adani Wilmar और Patanjali Foods जैसी बड़ी कंपनियाँ, जो इम्पोर्ट पर निर्भर मार्केट में कॉम्पिटिटिव प्राइसिंग के लिए इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन पर निर्भर करती हैं, चुनौतियों का सामना कर रही हैं। स्टैंडर्ड साइज के लिए प्रोडक्शन लाइनों को री-टूल करने से शॉर्ट-टर्म प्रॉफिट पर असर पड़ सकता है, खासकर पेट्रोकेमिकल्स से प्राप्त पैकेजिंग मटेरियल के लिए वर्तमान उच्च महंगाई को देखते हुए। नए नियम डोमेस्टिक और इम्पोर्टेड तेलों पर समान रूप से लागू होंगे, जिससे एक लेवल प्लेइंग फील्ड सुनिश्चित होगा, लेकिन शायद छोटे ब्रांडों को अपने कस्टम पैकेजिंग वॉल्यूम के साथ अलग दिखने के तरीकों को सीमित कर सकता है।

आगे क्या होगा?

इन नियमों की सफलता Legal Metrology अधिकारियों द्वारा लागू करने पर निर्भर करेगी। यदि इसे लागू किया जाता है, तो बड़े डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क वाली कंपनियाँ जो रीडिजाइन लागत को अवशोषित कर सकती हैं, उन्हें फायदा हो सकता है। छोटे, रीजनल कंपनियों को ट्रांजीशन के दौरान मार्जिन पर अधिक महत्वपूर्ण दबाव का अनुभव हो सकता है। विश्लेषकों का सुझाव है कि मानकीकरण भ्रामक प्रथाओं को कम करेगा, लेकिन रसोई तेल की वास्तविक कीमत केवल पैक साइज पर ही नहीं, बल्कि ग्लोबल इम्पोर्ट कीमतों और पैकेजिंग मटेरियल की लागत से भी प्रभावित होती रहेगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.