रिटेल सेक्टर में डिमांड बरकरार, पर मार्जिन पर बढ़ रहा दबाव
Retailers Association of India (RAI) की रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2026 में रिटेल सेल्स में साल-दर-साल 9% की ग्रोथ दर्ज की गई। यह ग्रोथ फेस्टिव सीजन के बाद कंज्यूमर खर्च में आई सामान्य स्थिति को दिखाती है। इस उछाल में शहरों और छोटे शहरों दोनों की अच्छी डिमांड का योगदान रहा। 'अपैरल और क्लोदिंग' कैटेगरी 12% बढ़ी, वहीं 'फूड और ग्रोसरी' सेक्टर 11% की रफ़्तार से आगे बढ़ा। सबसे ज़्यादा ग्रोथ पश्चिमी और पूर्वी भारत में 10% रही, जिसके बाद उत्तरी भारत 9% और दक्षिणी भारत 8% पर रहा।
वेस्ट एशिया टेंशन से बढ़ी लागतों की मार
हालांकि, इस अच्छी खबर के पीछे एक बड़ी चिंता भी छिपी है – बढ़ती लागतें। खासकर पश्चिम एशिया में चल रहे जियोपॉलिटिकल टेंशन के कारण क्रूड ऑयल (Brent crude) की कीमतें $110 प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं। इससे ट्रांसपोर्टेशन और लॉजिस्टिक्स का खर्च सीधा बढ़ रहा है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अगले फाइनेंशियल ईयर में एनर्जी, मेटल्स और फ्रेट की बढ़ती लागतों के चलते इंडियन रिटेल और FMCG कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन 40-60 बेसिस पॉइंट तक गिर सकते हैं। रुपये का 93.84 प्रति डॉलर का रेट भी इस कॉस्ट प्रेशर को और बढ़ा रहा है।
सेक्टर्स में मिला-जुला प्रदर्शन और बढ़ती कॉम्पिटिशन
सभी सेक्टर्स में ग्रोथ एक जैसी नहीं रही। 'कंज्यूमर ड्यूरेबल्स' की ग्रोथ थोड़ी धीमी, 7% रही। वहीं, 'Avenue Supermarts' (DMart) जैसी बड़ी कंपनियों ने Q3 FY26 में 13.2% रेवेन्यू ग्रोथ दर्ज की और अपने स्टोर्स की संख्या 442 कर ली। DMart के नतीजों में भी मार्जिन पर दबाव दिखा, जहाँ कंपनी ने सस्ते दाम और बढ़ते ऑपरेटिंग कॉस्ट्स का ज़िक्र किया। नए फॉर्मेट्स, प्राइवेट लेबल्स और डिजिटल ब्रांड्स से बढ़ती कॉम्पिटिशन के चलते रिटेलर्स को सिर्फ एक्सपेंशन की बजाय ऑपरेशंस और कस्टमर एंगेजमेंट पर ज़्यादा ध्यान देना पड़ रहा है।
भविष्य के लिए जोखिम और अनिश्चितता
आगे चलकर जियोपॉलिटिकल टेंशन, वोलेटाइल एनर्जी मार्केट और बढ़ती इंफ्लेशन रिटेल सेक्टर के लिए बड़े खतरे हैं। फरवरी का CPI इंफ्लेशन 3.21% था, लेकिन इसमें अभी हालिया तेल कीमतों में हुई बढ़ोतरी का पूरा असर नहीं जुड़ा है। यह महंगाई और बढ़ सकती है, जिससे 'Reserve Bank of India' (RBI) अपनी मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर सतर्क रह सकता है। इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से GDP ग्रोथ 15-40 बेसिस पॉइंट तक धीमी हो सकती है। बढ़ते खर्चों और संभावित आर्थिक मंदी के चलते कंज्यूमर्स भी अपनी गैर-जरूरी खर्चों में कटौती कर सकते हैं। इसके अलावा, बढ़ते रेंटल्स और स्किल्ड टैलेंट की कमी जैसी चुनौतियां भी रिटेलर्स, खासकर छोटे वालों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं।
लंबी अवधि में पॉजिटिव आउटलुक
लंबी अवधि में, एक्सपर्ट्स को भारत के रिटेल सेक्टर के लिए पॉजिटिव आउटलुक दिख रहा है। बढ़ती आय, शहरीकरण और डिजिटल अपनाने से आने वाले सालों में डबल-डिजिट ग्रोथ की उम्मीद है, खासकर टियर II और III शहरों में। हालांकि, 2026 में प्रॉफिट बनाए रखने के लिए कॉस्ट प्रेशर को प्रभावी ढंग से मैनेज करना महत्वपूर्ण होगा। जो रिटेलर्स ग्रोथ और कॉस्ट कंट्रोल को बैलेंस कर पाएंगे, सप्लाई चेन को ऑप्टिमाइज़ करेंगे और ग्लोबल अनिश्चितताओं के बीच कस्टमर की बदलती जरूरतों के हिसाब से ढलेंगे, वे सबसे बेहतर स्थिति में होंगे।
