प्रॉफिटेबिलिटी का अनोखा खेल: बिक्री है, पर मुनाफा नहीं!
भारतीय रिटेल सेक्टर में एक अजीब सी स्थिति पैदा हो गई है। जहाँ एक तरफ कंपनियां बिक्री (Sales) में बढ़ोतरी का दावा कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके कई स्टोर घाटे में चल रहे हैं। यह मामला डिमांड की कमी का नहीं, बल्कि ऑपरेश्नल इनएफिशिएंसी (operational inefficiency) का है, खासकर इन्वेंटरी ग्लट्स (inventory gluts) की वजह से। रिटेलर्स के शेल्फ पर पुराना और बिकने में धीमी गति वाला माल (slow-moving merchandise) जमा हो रहा है, जिससे मुनाफा कमाने का तय समय (profitable selling window) कम होता जा रहा है और नए माल (new-arrival merchandise) के लिए जगह नहीं बच रही है।
घाटे का आंकड़ा और माल का पहाड़
वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप (Vector Consulting Group) के एक सर्वे ने इस बात का खुलासा किया है कि भारत के करीब एक तिहाई ऑर्गनाइज्ड रिटेल स्टोर घाटे में हैं, यह आंकड़ा 28% से 40% तक है। यह तब हो रहा है जब कई कंपनियों की बिक्री के आंकड़े पॉजिटिव दिख रहे हैं। कंसल्टेंसी के मुताबिक, असली समस्या खराब लोकेशन या ऊंचे किराए की नहीं, बल्कि जमे हुए स्टॉक (stagnant stock) की है। चौंकाने वाली बात यह है कि 96% रिटेलर्स खराब माल को हटाने की बजाय उसे ज्यादा नजर आने वाली शेल्फ पर रख देते हैं। इसके साथ ही, 94% कंपनियां पुराना माल क्लियर किए बिना नए प्रोडक्ट लॉन्च कर रही हैं। इस शेल्फ कंजेशन (shelf congestion) की वजह से पिछले पांच सालों में माल को फुल प्राइस पर बेचने का समय लगातार कम होता गया है।
डेटा है, पर एक्शन नहीं
यह इन्वेंटरी का बोझ सीधे तौर पर पीईआर-स्क्वायर-फुट (per-square-foot) प्रॉफिटेबिलिटी जैसे जरूरी मेट्रिक्स को नुकसान पहुंचाता है। रिटेलर्स अक्सर बड़े ऑर्डर (opportunistic bulk purchases) और स्टॉक-कीपिंग यूनिट (एसकेयू - SKU) पोर्टफोलियो बढ़ाने के चक्कर में इन्वेंटरी बढ़ा लेते हैं। जब मार्केट में करेक्शन (market corrections) की जरूरत पड़ती है, तो स्टॉक की भारी मात्रा के कारण समय पर मार्कडाउन (markdown) या स्टॉक निकालने जैसे फैसले लेना मुश्किल हो जाता है। वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप के सीनियर पार्टनर पी सेंथिलकुमार (P Senthilkumar) बताते हैं कि ज्यादातर रिटेलर्स सेल्स पर स्क्वायर फुट (sales per square foot) और प्रॉफिट पर स्क्वायर फुट (profit per square foot) जैसे KPIs ट्रैक तो करते हैं, लेकिन सिर्फ 9% ही इस डेटा का इस्तेमाल रोजमर्रा की खरीद (purchasing decisions) के लिए करते हैं। डेटा होने और उस पर काम करने के बीच यह बड़ा गैप समस्या को बढ़ा रहा है, जिससे पैसा अनप्रोडक्टिव एसेट्स (unproductive assets) में फंसा रहता है।
स्टोर बंद करने की रणनीति
इस प्रॉफिटेबिलिटी की समस्या से निपटने के लिए कंपनियां अब कड़े कदम उठाने लगी हैं। Shoppers Stop के मैनेजिंग डायरेक्टर कविंद्र मिश्रा (Kavindra Mishra) ने एनालिस्ट्स को बताया है कि कंपनी स्टोर-लेवल पर प्रॉफिटेबिलिटी की बारीकी से जांच कर रही है। इसका मतलब है कि जहां से निकलना मुश्किल लग रहा है, ऐसे स्टोर को बंद करने का फैसला लिया जा सकता है, ताकि अगले फाइनेंशियल ईयर के मध्य तक कैपिटल को फ्री किया जा सके। Shoppers Stop का मार्केट कैपिटलाइजेशन ₹4,406 Cr (13 फरवरी 2026 तक) था, और इसका पी/ई रेश्यो (P/E ratio) 898.0 या -248.51 था, जो निवेशकों की चिंता को दिखाता है। 13 फरवरी 2026 को स्टॉक में 2.88% की गिरावट आई थी, जिसमें 38,275 शेयर ट्रेड हुए थे।
कंपटीटर्स की चाल और भविष्य
Shoppers Stop जहाँ इस समस्या से निपटने की बात कर रहा है, वहीं Trent का Westside फॉर्मेट डेटा-ड्रिवन अप्रोच और छोटे, जल्दी-जल्दी होने वाले रेप्लेनिशमेंट साइकल्स (replenishment cycles) से बेहतर इन्वेंटरी टर्नओवर रेशियो (inventory turnover ratios) दिखा रहा है। Reliance Retail अपनी AI-ड्रिवन इन्वेंटरी फोरकास्टिंग (AI-driven inventory forecasting) से ओवरस्टॉकिंग (overstocking) को कम कर रहा है। पिछले 2025 की शुरुआत में एक ऐसे ही कंपटीटर के इन्वेंटरी बढ़ाने पर दो महीने में 10% की स्टॉक प्राइस करेक्शन (stock price correction) हुई थी। भविष्य में, भारतीय रिटेल सेक्टर के 2034 तक $2.2 ट्रिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। लेकिन, इन्फ्लेशनरी प्रेशर्स (inflationary pressures) और कंज्यूमर स्पेंडिंग (consumer spending) में सावधानी कम प्रॉफिट कमाने वाली कंपनियों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकती है। Shoppers Stop और इसके साथियों के लिए जरूरी है कि वे सिर्फ बिक्री बढ़ाने की बजाय प्रॉफिटेबल ग्रोथ (profitable growth) पर ध्यान दें, इन्वेंटरी मैनेजमेंट (inventory management) को बेहतर करें और डेटा का इस्तेमाल करें। एनालिस्ट्स का 'Buy' रेटिंग के साथ एवरेज प्राइस टारगेट (average price target) सीमित अपसाइड का संकेत दे रहा है।
