भारत का प्लांट-बेस्ड प्रोटीन इंग्रीडिएंट मार्केट अगले पांच साल में दोगुना होकर **₹9,000 करोड़** के स्तर पर पहुंच सकता है। **18%** की सालाना दर से बढ़ने वाले इस सेक्टर में भारी इंपोर्ट निर्भरता और बड़े निवेश की जरूरत निवेशकों के लिए अहम मुद्दे हैं।
बाजार में तेज रफ्तार
प्लांट-बेस्ड प्रोटीन इंग्रीडिएंट्स का भारतीय बाजार तेजी से एक्सपेंशन की राह पर है। वर्तमान में ₹4,500 करोड़ की वैल्यू वाला यह सेक्टर आने वाले 5 वर्षों में ₹9,000 करोड़ तक पहुंच सकता है। इसकी 18% की सालाना ग्रोथ रेट ग्लोबल औसत 7-8% से कहीं ज्यादा है, जो देश में न्यूट्रिशनल अवेयरनेस और लोकल मैन्युफैक्चरिंग पर बढ़ते फोकस को दर्शाती है।
इंपोर्ट का बोझ और जोखिम
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस सेक्टर की 90% इंपोर्ट निर्भरता है। इतनी ज्यादा विदेशी निर्भरता सप्लाई चेन को ग्लोबल प्राइस फ्लक्चुएशन और करेंसी रिस्क के प्रति संवेदनशील बनाती है। हालांकि, यही वह जगह है जहां 'इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन' का बड़ा मौका है, जिससे डोमेस्टिक प्लेयर्स अपने प्रोडक्शन कॉस्ट को कम कर सकते हैं।
बड़े निवेश की दरकार
इस सेक्टर में एंट्री आसान नहीं है। एक मीडियम-स्केल एक्सट्रैक्शन फैसिलिटी, जिसकी क्षमता 10-15 टन प्रतिदिन हो, उसे लगाने के लिए ₹200-250 करोड़ के शुरुआती कैपिटल की जरूरत होती है। यह हाई कैपिटल इंटेंसिटी एक बैरियर की तरह काम करती है, जिससे केवल मजबूत बैलेंस शीट वाली कंपनियां ही अपनी पकड़ बना पाएंगी।
एग्री-बेस का फायदा
भारत के पास विशाल कृषि आधार है, जिसका लाभ उठाकर कंपनियां इंपोर्टेड इंग्रीडिएंट्स के मुकाबले कम लागत में प्रोडक्शन कर सकती हैं। आने वाले समय में जो कंपनियां किसानों और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स के बीच तालमेल बिठाकर प्रोडक्शन को लोकल बनाएंगी, वही इस मार्केट में लंबी रेस की खिलाड़ी साबित होंगी।
