Ministry of Consumer Affairs ने बड़ा फैसला लेते हुए सभी पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स, जैसे साबुन और टूथपेस्ट पर वेज या नॉन-वेज का लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया है। Legal Metrology नियमों में हुए इस बदलाव से एफएमसीजी कंपनियों के सामने पैकेजिंग और सप्लाई चेन को अपडेट करने की चुनौती बढ़ गई है।
नियम में क्या है बदलाव?
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने Legal Metrology (Packaged Commodities) Rules, 2011 के तहत नए नियम लागू किए हैं। इसके अनुसार, अब सभी साबुन, टूथपेस्ट और कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स पर यह बताना जरूरी होगा कि उनमें इस्तेमाल सामग्री वेज है या नॉन-वेज। वेज सामग्री वाले उत्पादों पर 'हरा डॉट' और नॉन-वेज के लिए 'लाल या भूरा डॉट' का निशान लगाना अनिवार्य होगा। यह बदलाव सीधे तौर पर रिटेल पॉइंट ऑफ सेल पर कंज्यूमर चॉइस को प्रभावित करेगा।
कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
Hindustan Unilever, Godrej Consumer, Colgate-Palmolive, Dabur और Marico जैसी बड़ी एफएमसीजी कंपनियों के लिए यह सिर्फ एक लेबलिंग का बदलाव नहीं है। कई पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स में फैटी एसिड या ग्लिसरीन जैसे नॉन-वेजीटेरियन तत्वों का उपयोग होता है, जिसके लिए अब ऑडिट करना जरूरी हो गया है। इसके अलावा, पुरानी पैकेजिंग को हटाकर नई लेबलिंग वाली स्टॉक लाना कंपनियों के लिए एक बड़ी ऑपरेशनल चुनौती है, जिससे लागत बढ़ सकती है।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर नजर रखनी चाहिए। पैकेजिंग को फिर से डिजाइन करने का खर्चा 'वन-टाइम एक्सपेंस' के तौर पर दिख सकता है। साथ ही, अगर सप्लाई चेन में कोई रुकावट आती है, तो इसका असर डिस्ट्रिब्यूशन पर भी पड़ सकता है। मार्केट एक्सपर्ट्स अब कंपनियों की मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर बनाए हुए हैं ताकि यह समझा जा सके कि इस अनुपालन (Compliance) का उनके मार्केटिंग और ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर क्या असर होगा।
