उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स जैसे साबुन और शैम्पू के लिए वेज और नॉन-वेज लेबलिंग अनिवार्य कर दी है। **21 सितंबर 2026** से लागू होने वाले इस नियम से कंपनियों के कम्प्लायंस और पैकेजिंग खर्च में बढ़ोतरी की संभावना है।
उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय (Ministry of Consumer Affairs) ने पर्सनल केयर सेगमेंट में एक बड़ा रेगुलेटरी बदलाव किया है। अब साबुन, शैम्पू, टूथपेस्ट और अन्य सौंदर्य प्रसाधनों पर वेज और नॉन-वेज की स्पष्ट जानकारी देना अनिवार्य होगा। 'लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) फोर्थ अमेंडमेंट रूल्स, 2026' के तहत, 21 सितंबर 2026 से कंपनियों को अपने पैकेजिंग के मुख्य हिस्से पर शाकाहारी उत्पादों के लिए 'हरा बिंदु' और मांसाहारी सामग्रियों के लिए 'लाल या भूरा बिंदु' लगाना होगा।
कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
यह नियम फूड और बेवरेज इंडस्ट्री के स्टैंडर्ड्स के तर्ज पर लाया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्राहकों को प्रोडक्ट के इंग्रीडिएंट्स के बारे में पूरी पारदर्शिता देना है। हालांकि, हिंदुस्तान यूनिलीवर (Hindustan Unilever), गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स (Godrej Consumer Products), डाबर इंडिया (Dabur India), कोलगेट-पामोलिव (Colgate-Palmolive) और आईटीसी (ITC) जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है।
कंपनियों को अब अपने हजारों स्टॉक-कीपिंग यूनिट्स (SKUs) की पैकेजिंग डिजाइन को तेजी से बदलना होगा। पैकेजिंग बदलने का मतलब न केवल नए डिजाइन तैयार करना है, बल्कि पुराने स्टॉक को हटाना और नई सप्लाई चेन के अनुसार लॉजिस्टिक्स मैनेज करना भी है।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
निवेशकों को अब यह देखना होगा कि बड़ी FMCG कंपनियां कितनी तेजी से इन नए नियमों के साथ अपनी सप्लाई चेन को तालमेल में लाती हैं। हालांकि बड़े कॉर्पोरेट्स के लिए लागत का असर सीमित हो सकता है, लेकिन लागू करने की गति बहुत महत्वपूर्ण है ताकि कोई रेगुलेटरी समस्या न खड़ी हो। आने वाली तिमाहियों में यह देखना होगा कि कंपनियां बिना डिस्ट्रिब्यूशन में बाधा डाले और अतिरिक्त लागत बढ़ाए इस बदलाव को कैसे मैनेज करती हैं।
