नियमों में एक दशक की देरी, सेहत का बढ़ता जोखिम
दुनियाभर के कई देश जैसे चिली और यूरोपीय यूनियन (EU) ने 18 महीने से लेकर 4 साल के भीतर ऐसे चेतावनी लेबल लागू कर दिए, लेकिन भारत में यह प्रक्रिया एक दशक से अटकी हुई है। भारत का यह लंबा सफर, अन्य देशों की तुलना में, या तो अनोखी चुनौतियों को दर्शाता है या फिर नियामक प्रक्रिया की अक्षमताओं को।
उपभोक्ता पोषण संबंधी जानकारी से अनजान
इस देरी के चलते भारतीय उपभोक्ता पैकेज्ड फूड में मौजूद चीनी, नमक और फैट (वसा) की मात्रा के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी से अनजान हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंता जता रहे हैं कि यह अनभिज्ञता डायबिटीज और हृदय रोगों जैसी गैर-संचारी बीमारियों (non-communicable diseases) के बढ़ते मामलों में योगदान कर रही है, जो अत्यधिक सेवन से जुड़ी हैं।
खाद्य उद्योग के लिए अनिश्चितता का माहौल
खाद्य उद्योग के लिए भी यह अनिश्चितता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। निर्माता अपने उत्पादों के फ़ॉर्मूलेशन (reformulation) और पैकेजिंग में बदलाव जैसे फैसले लेने में हिचकिचा रहे हैं। इससे अनुपालन लागत (compliance costs) बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ तालमेल बिठाना मुश्किल हो रहा है, जिससे निवेश पर भी असर पड़ रहा है।
नियामक प्रक्रिया पर सवाल
FSSAI की इस लंबी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह उद्योग के प्रभाव में धीमी हो रही है। हाल की एक कंसल्टेशन में 60 से अधिक खाद्य उद्योग के प्रतिनिधियों के मुकाबले केवल दो सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को शामिल किया गया था। यह असंतुलन संकेत देता है कि नीति निर्माण में उद्योग लॉबिंग या प्रशासनिक अड़चनों का प्रभाव हो सकता है, जो मौजूदा स्थिति को बनाए रखने के पक्ष में है।
आगे का रास्ता अनिश्चित
भारत के FOPL नियमों को अंतिम रूप देने का रास्ता अभी भी अनिश्चित बना हुआ है, और यह लंबा इंतजार और बढ़ सकता है। जब तक निर्णायक कार्रवाई और स्पष्ट समय-सीमा नहीं होती, उपभोक्ता स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करते रहेंगे और खाद्य उद्योग योजना बनाने के दुष्चक्र में फंसा रहेगा।