भारत में इस बार फेस्टिव सीजन के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री का **60% से 70%** हिस्सा EMI यानी क्रेडिट पर हो रहा है। हालांकि इससे कंपनियों की सेल तो बढ़ रही है, लेकिन आम परिवारों पर कर्ज का बोझ भी तेजी से बढ़ रहा है।
क्या है 'Double EMI Trap'?
त्योहारी सीजन में लोग जमकर खरीदारी कर रहे हैं, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा उधार (Credit) से आ रहा है। मुसीबत तब खड़ी होती है जब कोई महंगा इलेक्ट्रॉनिक आइटम, जैसे फ्रिज या टीवी खराब हो जाता है। ऐसे में मरम्मत का खर्च जेब पर भारी पड़ता है। यदि परिवार पुराने सामान को ठीक कराने के बजाय नया लेने का फैसला करता है, तो उसे पुरानी EMI के साथ नई EMI भी भरनी पड़ सकती है। इसी स्थिति को एनालिस्ट्स 'Double EMI Trap' कह रहे हैं, जो मिडिल क्लास की डिस्पोजेबल इनकम को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
NBFCs और बैंकों पर असर
छोटे शहरों (Tier II और Tier III) में डिजिटल फाइनेंसिंग के विस्तार से सेल्स में जबरदस्त उछाल तो आया है, लेकिन NBFCs और फिनटेक कंपनियों के लिए चुनौतियां भी बढ़ गई हैं। अगर आमदनी में उतार-चढ़ाव हुआ, तो रिटेल लोन में डिफॉल्ट (Delinquency) बढ़ने का खतरा है। यही कारण है कि Reserve Bank of India (RBI) रिटेल क्रेडिट की इस तेज रफ्तार पर लगातार नजर बनाए हुए है।
भविष्य के लिए सबक
इन्वेस्टर्स के लिए यह समझना जरूरी है कि यह सेल्स का आंकड़ा 'ऑर्गेनिक ग्रोथ' है या सिर्फ 'क्रेडिट-फ्यूल्ड डिमांड'। बाजार में एक और समस्या यह दिख रही है कि लोग खरीदारी के समय एक्सटेंडेड वॉरंटी (Extended Warranty) नहीं ले रहे हैं, जिससे डिवाइस खराब होने पर सारा जोखिम सीधे ग्राहक पर आ जाता है। आने वाले समय में रूरल और सेमी-अर्बन मार्केट्स में बढ़ते कर्ज का असर देखना काफी महत्वपूर्ण होगा।
