भारत के FMCG सेक्टर में बड़ी कंपनियों का दबदबा बढ़ता दिख रहा है। 2025 में छोटे ब्रांड्स के मुकाबले बड़े ब्रांड्स की पहुंच ज्यादा बढ़ी है। रिपोर्ट बताती है कि छोटे ब्रांड्स के लिए डिस्ट्रीब्यूशन और ग्राहकों को बार-बार खरीदने के लिए प्रेरित करना सबसे बड़ी चुनौती बन रहा है।
बड़े ब्रांड्स का जलवा, छोटे ब्रांड्स की मुश्किल
भारत का FMCG (फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स) सेक्टर दो हिस्सों में बंटता जा रहा है। एक तरफ स्थापित और बड़ी कंपनियां अपनी मार्केट पोजिशन मजबूत कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर छोटे और नए ब्रांड्स के लिए ग्राहकों तक पहुंच बनाना और अपना बेस बढ़ाना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।
'Brand Footprint India 2026' रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में केवल 56% छोटे ब्रांड्स ही अपने कंज्यूमर रीच पॉइंट्स (CRP) यानी कितने घरों में और कितनी बार उनके प्रोडक्ट खरीदे गए, इसमें बढ़ोतरी कर पाए। इसकी तुलना में, बड़ी और स्थापित ब्रांड्स के लिए यह आंकड़ा 83% रहा। मिड-साइज़ ब्रांड्स ने भी 78% की ग्रोथ हासिल की।
यह दिखाता है कि सिर्फ प्रोडक्ट का दिखना या मार्केट में मौजूद होना काफी नहीं है। छोटे प्लेयर्स के लिए असली चुनौती है कि वे अपनी विजिबिलिटी को लगातार ग्राहकों द्वारा बार-बार प्रोडक्ट खरीदने में बदलें। इसके लिए मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और लगातार मार्केटिंग पर भारी निवेश की जरूरत होती है।
मार्केट में बढ़त जारी, कुछ छोटे ब्रांड्स भी चमके
इन मुश्किलों के बावजूद, FMCG मार्केट लगातार बढ़ रहा है। 2025 में कुल कंज्यूमर चॉइस 5.1% बढ़कर 129 बिलियन CRP तक पहुंच गया। मार्केट लीडरशिप अभी भी कुछ ही कंपनियों के हाथ में है। Parle Products लगातार 14वें साल इन-होम कंजम्पशन में टॉप पर रहा, इसके बाद Britannia Industries का नंबर आया। आउट-ऑफ-होम कंजम्पशन में भी Britannia का दबदबा कायम रहा, जबकि Amul टॉप 5 में जगह बनाने में कामयाब रहा।
हालांकि, यह ट्रेंड बड़े प्लेयर्स के पक्ष में जाता दिख रहा है, लेकिन कुछ छोटे और रीजनल ब्रांड्स ने भी अपनी काबिलियत साबित की है। Balaji Wafers पहली बार टॉप 10 इन-होम ब्रांड रैंकिंग में नौवें स्थान पर पहुंचा। Rin, Sunrise और Exo जैसे ब्रांड्स ने भी अपनी रैंकिंग में अच्छी तरक्की दिखाई है, जो साबित करता है कि सही रणनीति और रीजनल फोकस से छोटे ब्रांड्स भी बाजी मार सकते हैं।
लागत का दबाव और बदलते बाजार के मायने
FMCG सेक्टर पर लागत का दबाव भी पड़ रहा है, खासकर पाम ऑयल, क्रूड और पैकेजिंग मटेरियल जैसी चीजों के दाम ऊपर-नीचे होने से। बड़े ब्रांड्स इन लागतों को बेहतर तरीके से मैनेज कर पाते हैं, जबकि छोटे प्लेयर्स के लिए यह एक बड़ी चुनौती है।
मार्केट में एक और बड़ा बदलाव आ रहा है। क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स का उदय और ग्राहकों का प्रीमियम व पर्सनलाइज्ड प्रोडक्ट्स की ओर झुकाव, खरीद-बिक्री के तरीके को बदल रहा है। जो छोटे ब्रांड्स इन नए रिटेल फॉर्मेट्स के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं, वे बड़े प्लेयर्स की डिस्ट्रीब्यूशन एफिशिएंसी से पिछड़ रहे हैं।
आने वाले समय में, FMCG सेक्टर के हितधारक मैक्रोइकॉनॉमिक्स पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। मॉनसून का पूर्वानुमान, जैसे कि सामान्य से कम बारिश की आशंका, ग्रामीण आय और मास-मार्केट प्रोडक्ट्स की मांग पर सीधा असर डाल सकती है। छोटे ब्रांड्स के लिए यह देखना अहम होगा कि वे कैसे प्रीमियम प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ते मार्केट ट्रेंड को अपनाते हैं और सप्लाई चेन को मजबूत बनाए रखते हैं।
