भारत का डायरेक्ट सेलिंग सेक्टर फाइनेंशियल ईयर 2025 में **₹23,522 करोड़** के टर्नओवर के साथ **7%** की सालाना ग्रोथ दर्ज कर रहा है। हालांकि वेलनेस और पर्सनल केयर सेगमेंट मार्केट पर हावी हैं, लेकिन बड़े खिलाड़ियों का दबदबा अभी भी सेक्टर की एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
भारत के डायरेक्ट सेलिंग इंडस्ट्री ने एक नया मुकाम हासिल करते हुए फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में ₹23,522 करोड़ का कुल सेल्स वॉल्यूम दर्ज किया है। पिछले 5 सालों में यह सेक्टर ₹16,776 करोड़ (फाइनेंशियल ईयर 2020) से बढ़कर आज इस मुकाम पर पहुंच गया है। फिलहाल, इस सेक्टर से 91 लाख लोग सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं, जिसमें महिलाओं की भागीदारी 47% है।
मार्केट के मुख्य आधार
इंडस्ट्री की ग्रोथ का सबसे बड़ा हिस्सा हेल्थ और ब्यूटी प्रोडक्ट्स से आ रहा है। अकेले वेलनेस प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 61% है। यदि इसमें कॉस्मेटिक्स और पर्सनल केयर को भी जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा कुल टर्नओवर का 86% हो जाता है। भौगोलिक दृष्टि से देखें तो महाराष्ट्र ₹3,058 करोड़ की बिक्री के साथ देश में सबसे आगे है, जबकि टॉप 10 राज्य मिलकर कुल रेवेन्यू का 70% हिस्सा नियंत्रित करते हैं।
बड़े खिलाड़ियों का दबदबा और चुनौतियां
सेक्टर में एक बड़ी समस्या 'मार्केट पोलराइजेशन' की है। देश की 6 बड़ी कंपनियां पूरे मार्केट के 68% रेवेन्यू को नियंत्रित करती हैं, जबकि 400 से अधिक छोटी कंपनियां ₹10 करोड़ सालाना से कम का बिजनेस कर पा रही हैं। इसके अलावा, भारत में प्रति व्यक्ति (पर-कैपिटा) खर्च केवल $2 है, जो ग्लोबल मार्केट के $8 से $12 के औसत से काफी कम है। ग्लोबल टॉप 10 में शामिल होने के लिए इंडस्ट्री को 12% से 14% की रफ्तार से बढ़ना होगा।
रेगुलेटरी सुधारों की मांग
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि 'कंज्यूमर प्रोटेक्शन (डायरेक्ट सेलिंग) रूल्स, 2021' के बाद अब एक समर्पित रेगुलेटरी बॉडी की जरूरत है, जो SEBI या IRDAI की तरह काम कर सके। इसका मुख्य उद्देश्य वैध बिजनेस और मनी सर्कुलेशन स्कीम के बीच स्पष्ट अंतर करना और छोटे सेलर्स के लिए बैंकिंग और क्रेडिट सुविधाएं आसान बनाना है।
