भारत में डार्क चॉकलेट की मांग में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। अर्बन सेंटर्स में क्विक-कॉमर्स की पहुंच और बढ़ती हेल्थ-अवेयरनेस के कारण घरों में इसकी खपत **45%** बढ़ गई है, हालांकि ₹15,000 करोड़ के कुल मार्केट में यह अभी भी एक छोटा हिस्सा है।
अर्बन इलाकों का दबदबा
अगस्त तक के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय घरों में डार्क चॉकलेट की डिमांड में 45% का उछाल दर्ज किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि कुल होम-कंजम्पशन का 87% हिस्सा केवल बड़े शहरों से आ रहा है।
क्विक-कॉमर्स का जादू
इस बदलाव के पीछे क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स का बड़ा हाथ है। प्रीमियम और हाई-कोकोआ कंटेंट वाले प्रोडक्ट्स जो पहले सिर्फ चुनिंदा स्टोर्स पर मिलते थे, अब चंद मिनटों में ग्राहकों के घर पहुंच रहे हैं। इसने 'इम्पल्स बाइंग' (तुरंत खरीदारी) को बढ़ावा दिया है।
मार्केट की हकीकत और चुनौतियां
भारतीय चॉकलेट मार्केट का कुल साइज ₹15,000 करोड़ का है, जिसमें डार्क चॉकलेट का हिस्सा अभी भी काफी कम है। भारत में प्रति व्यक्ति चॉकलेट खपत मात्र 200 ग्राम सालाना है, जो विकसित देशों के मुकाबले बहुत कम है।
ITC, Mondelez और Ferrero जैसी कंपनियां इस बढ़ती मांग को भुनाने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि, कंपनियों के सामने दो बड़े संकट हैं:
- प्राइस सेंसिटिविटी: प्रीमियम और अधिक कोकोआ वाली चॉकलेट्स की प्रोडक्शन कॉस्ट ज्यादा होती है, जिससे मार्जिन पर दबाव रहता है।
- ग्लोबल कोकोआ प्राइस: ग्लोबल मार्केट में कोकोआ की कीमतों में उतार-चढ़ाव कंपनी के मुनाफे को सीधे प्रभावित करता है।
इन्वेस्टर्स के लिए सलाह है कि वे केवल रेवेन्यू न देखें, बल्कि इस प्रीमियम सेगमेंट में वॉल्यूम ग्रोथ पर नजर रखें। क्या कंपनियां शहरों के बाहर अपनी पकड़ बना पाएंगी? यह आने वाले समय में इन कंपनियों के स्टॉक्स के लिए बड़ा ट्रिगर साबित होगा।
