जजों का कड़ा रुख, सेहत को पहली प्राथमिकता
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे बी पारदीवाला और के वी विश्वनाथन ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) को फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा है कि नागरिकों के स्वास्थ्य को बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) की सुविधा के ऊपर रखा जाना चाहिए। जजों ने FSSAI को अगले तीन हफ्तों के भीतर रिसर्च को अंतिम रूप देने का आदेश दिया है, क्योंकि इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर पिछले लगभग एक दशक से हो रही देरी से कोर्ट काफी नाराज़ है। यह निर्देश कंपनियों को उनके उत्पादों में चीनी, नमक और फैट की मात्रा को लेकर सीधे जवाबदेह ठहराएगा।
दुनिया भर के मॉडल और भारतीय बाज़ार पर असर
दुनिया भर के कई देशों ने पैकेटबंद खाने के सामान पर चेतावनी लेबल (Front-of-Pack Warning Labels - FOPWL) लागू किए हैं। उदाहरण के तौर पर, चिली ने 2016 में काले अष्टकोणीय चेतावनी लेबल लगाए, जिसके बाद कई कंपनियों ने अपने उत्पादों में चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा कम की ताकि वे उपभोक्ताओं की नज़रों में गलत न ठहरें। मेक्सिको और पेरू जैसे देशों में भी ऐसे ही सिस्टम लागू हैं। भारत में भी यह कदम इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। तेजी से बढ़ते भारतीय पैकेटबंद खाद्य बाज़ार पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। शहरीकरण और बढ़ती आय के चलते लोग सेहत को लेकर ज़्यादा जागरूक हो रहे हैं, और वे स्पष्ट पोषण संबंधी जानकारी चाहते हैं, हालांकि कीमत अभी भी एक अहम फैक्टर है। FOPWL से स्वस्थ विकल्पों की मांग बढ़ सकती है।
एक दशक लंबी कानूनी लड़ाई
भारत में FOPWL लागू करने की कवायद 2014 में ही FSSAI द्वारा पोषण संबंधी लेबलिंग के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के साथ शुरू हुई थी। पिछले दस सालों में कई कमेटियों की समीक्षाएं और जन सुनवाई हुई, जिसमें 14,000 से ज़्यादा सुझाव आए। इस देरी की वजह विस्तृत स्टेकहोल्डर परामर्श और विशाल बाज़ार में इसे लागू करने की जटिलता बताई गई। लेकिन अब जुडिशरी की सीधी दखल से इस प्रक्रिया को नई रफ़्तार मिली है। वॉलंटरी (स्वैच्छिक) पहलों के विपरीत, अनिवार्य चेतावनी लेबल कंपनियों के पास उत्पाद में बदलाव करने के अलावा ज़्यादा विकल्प नहीं छोड़ते। ऐसे लेबल की प्रभावशीलता उनके स्पष्ट डिज़ाइन और व्यापक रूप से अपनाने पर निर्भर करेगी, जिसे FSSAI को अब तेज़ी से सुनिश्चित करना होगा।
आगे की राह में क्या हैं चुनौतियाँ?
सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बावजूद, FOPWL को प्रभावी ढंग से लागू करने में कई चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं। बहुराष्ट्रीय और घरेलू दोनों तरह की कंपनियाँ आगे और लॉबिंग कर सकती हैं या अपने स्थापित, ज़्यादा मुनाफा देने वाले उत्पादों की बिक्री पर संभावित नकारात्मक असर का हवाला दे सकती हैं। FSSAI के सामने मानकीकृत टेस्टिंग प्रोटोकॉल, विभिन्न रिटेल चैनलों पर प्रवर्तन और उपभोक्ता शिक्षा जैसे लॉजिस्टिकल हर्डल्स भी बड़े हैं। इस बात का एक ठोस जोखिम है कि शुरुआती उपभोक्ता प्रतिक्रिया के चलते कुछ प्रोसेस्ड फूड कैटेगरी की बिक्री कम हो सकती है, जिससे उन निर्माताओं की आमदनी पर असर पड़ सकता है जो जल्दी से उत्पाद में बदलाव नहीं कर पाते। इसके अलावा, कोर्ट का FOPWL पर ध्यान केंद्रित करना FSSAI की उन व्यापक चुनौतियों को कम नहीं करता जिनसे पूरे भारतीय खाद्य उद्योग को जूझना पड़ता है, जो अभी भी बिखरा हुआ है और अपने नियामक जटिलताओं से जूझ रहा है।
भविष्य की ओर एक कदम
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश ने पैकेटबंद खाद्य पदार्थों को लेकर भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंडे में एक अहम तात्कालिकता ला दी है। आने वाले वर्षों में, अनिवार्य FOPWL के लागू होने से उत्पादों में महत्वपूर्ण नवाचार (innovation) की उम्मीद है, क्योंकि निर्माता उपभोक्ताओं की बदलती पसंद और नियामक मांगों को पूरा करने का प्रयास करेंगे। इंडस्ट्री विश्लेषकों का मानना है कि जो कंपनियाँ अपने उत्पादों को बेहतर पोषण प्रोफाइल के लिए सक्रिय रूप से रीफॉर्मेट (reformulate) करेंगी, उन्हें प्रतिस्पर्धी बढ़त हासिल होगी। ऐसे स्वास्थ्य-जागरूक उपभोक्ताओं के बीच ब्रांड लॉयल्टी और बाज़ार हिस्सेदारी में सुधार संभव है। इस पहल की सफलता अंततः FSSAI की कार्यान्वयन की जटिलताओं को नेविगेट करने की क्षमता और नियामकों तथा उद्योग दोनों की ओर से नागरिकों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की निरंतर प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगी।