बाज़ार में हलचल, बड़े खिलाड़ियों की नज़र
भारतीय पेय बाज़ार (Beverage Market) इस समय ज़बरदस्त ग्रोथ दिखा रहा है और अब यह बड़ी बिज़नेस फैमिलीज के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। रिपोर्ट्स की मानें तो, एक बड़ा भारतीय बिज़नेस घराना (Conglomerate) इस गेम में उतरने की फिराक में है। इसके संकेत ग्लोबल और डोमेस्टिक पेय कंपनियों के साथ चल रही बातचीत और नए एग्ज़िक्यूटिव्स की की जा रही हायरिंग से मिल रहे हैं। इस तरह की एंट्री से भारतीय बाज़ार में कॉम्पिटिशन (Competition) का समीकरण पूरी तरह से बदल सकता है।
बाज़ार का साइज़ और ग्रोथ
भारत का कुल पेय बाज़ार, जो 2025 में करीब 80.11 बिलियन USD का था, 2035 तक 154.67 बिलियन USD तक पहुंचने का अनुमान है। इसकी सालाना ग्रोथ रेट (CAGR) 6.80% रहने की उम्मीद है।
खासकर RTD (Ready-to-Drink) नॉन-अल्कोहलिक सेगमेंट तेज़ी से बढ़ रहा है। यह 2025 में करीब 20 बिलियन USD से बढ़कर 2030 तक 40 बिलियन USD हो सकता है। इसमें क्विक कॉमर्स (Quick Commerce) और तुरंत इस्तेमाल की जाने वाली चीज़ों की ओर बढ़ते झुकाव का बड़ा रोल है।
वहीं, शराब बाज़ार (Alcoholic Beverage Market), जो 2025 में लगभग 148.3 बिलियन USD का था, 2034 तक 176.2 बिलियन USD तक पहुँच सकता है, जिसका CAGR 1.84% है। शहरीकरण (Urbanization) और प्रीमियम-ईज़ेशन (Premiumization) ट्रेंड्स इसके मुख्य कारण हैं।
प्रमुख प्लेयर्स और नई चुनौती
फिलहाल इस बाज़ार में Varun Beverages Ltd. (जो PepsiCo के अमेरिका के बाहर सबसे बड़े बॉटलर हैं), Coca-Cola India और Tata Consumer Products Ltd. जैसे बड़े नाम मौजूद हैं।
शराब के क्षेत्र में United Breweries Ltd. (Heineken India) बीयर में आगे है। वहीं, Pernod Ricard India ने FY24 में United Spirits (Diageo India) को पीछे छोड़कर रेवेन्यू के मामले में टॉप स्पिरिट्स मेकर का खिताब हासिल किया है।
बिज़नेस घराने के फायदे और चुनौतियाँ
एक बड़े बिज़नेस घराने के उतरने से उसकी मौजूदा रिटेल फुटप्रिंट (Retail Footprint) और फैला हुआ डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क (Distribution Network) बड़ा हथियार साबित हो सकता है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) बिखरे हुए डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों में पैर जमाने और अलग-अलग कंज्यूमर सेगमेंट्स तक पहुँचने में मदद करेगा।
हालांकि, यह रास्ता आसान नहीं होगा। खासकर शराब के मामले में रेगुलेटरी (Regulatory) माहौल एक बड़ी चुनौती है। शराब राज्यों का विषय होने के कारण हर राज्य में नीतियां, टैक्स और लाइसेंसिंग की ज़रूरतें अलग-अलग हैं। साथ ही, GST (Goods and Services Tax) के दायरे से बाहर होने के कारण देश भर में एक जैसी कीमत और डिस्ट्रीब्यूशन में दिक्कतें आती हैं।
इसके अलावा, कंज्यूमर की हेल्थ और वेलनेस (Health and Wellness) की ओर बढ़ता झुकाव, जिसमें कम शुगर और फंक्शनल इंग्रेडिएंट्स (Functional Ingredients) की मांग है, एक और अहम पहलू है। वहीं, शराब में प्रीमियम-ईज़ेशन का ट्रेंड भी लगातार बढ़ रहा है, खासकर प्रीमियम और सुपर-प्रीमियम स्पिरिट्स की मांग 'K-shaped' पैटर्न में दिख रही है।
ब्रांड इक्विटी (Brand Equity) बनाने के लिए पारंपरिक एडवरटाइजिंग (Advertising) पर लगी पाबंदियों से निपटना और संभावित रेगुलेटरी बदलावों, जैसे सरोगेट एडवरटाइजिंग (Surrogate Advertising) पर कड़े नियम, को समझना भी ज़रूरी होगा। मास-मार्केट और ग्रामीण इलाकों में मांग में उतार-चढ़ाव भी एक चुनौती पेश करता है।
