पैकेजिंग की मार: कंपनियों ने बताई वजह
यूरोप की दिग्गज बेवरेज कंपनियों के ग्रुप ने भारत सरकार से कांच की बोतलों और एल्यूमीनियम के डिब्बों पर आयात शुल्क माफ करने की औपचारिक अपील की है। इन कंपनियों में Pernod Ricard, Anheuser-Busch InBev, Heineken और Carlsberg जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं। उनका कहना है कि पैकेजिंग सप्लाई में गंभीर कमी आ गई है और स्थानीय निर्माता मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
इस किल्लत की मुख्य वजह मध्य-पूर्व में बढ़ी भू-राजनीतिक तनाव है, खासकर ईरान से जुड़ा संघर्ष, जिसने वैश्विक कमोडिटी की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है। कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल ने प्लास्टिक और लैमिनेट जैसे जरूरी मटेरियल की लागत बढ़ा दी है। वहीं, कांच और एल्यूमीनियम जैसे एनर्जी-इंटेंसिव उद्योगों पर भी भारी मार पड़ी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कांच की बोतलों की कीमत 15-20% तक बढ़ गई है, और एल्यूमीनियम की कीमतें पिछले चार सालों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। शिपिंग रूट्स, जैसे कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, में आई बाधाओं ने लॉजिस्टिक्स लागत को और बढ़ा दिया है।
भारत के नियम बने सिरदर्द
इन वैश्विक चुनौतियों के बीच, भारत के सख्त नियम कंपनियों के लिए और भी सिरदर्द बन गए हैं। देश के करीब दो-तिहाई यानी 28 राज्यों में, शराब की खुदरा कीमतों में बदलाव के लिए कंपनियों को सरकारी मंजूरी लेनी पड़ती है। यह प्रक्रिया लंबी और प्रतिबंधात्मक है, जिससे कंपनियां पैकेजिंग मटेरियल की बढ़ी हुई लागत को सीधे ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं। आपको बता दें कि पैकेजिंग की लागत बीयर के प्रोडक्शन कॉस्ट का 40% तक और स्पिरिट्स के लिए करीब 20% तक हो सकती है। भारत का अल्कोहल मार्केट, जिसका अनुमानित मूल्य $65 बिलियन है और तेजी से बढ़ने की उम्मीद है, अगर लागत बढ़ती रही और कीमतें स्थिर रहीं तो सप्लाई में कमी और घटते मुनाफे का सामना कर सकता है।
ग्लोबल दिग्गजों का dilemma
Heineken, जिसके पास भारत के बीयर मार्केट का लगभग आधा हिस्सा है, वहीं Anheuser-Busch InBev और Carlsberg की हिस्सेदारी करीब 19% है, ये सब मुश्किल में हैं। Diageo और Pernod Ricard स्पिरिट्स सेगमेंट में बड़ा दखल रखते हैं। इन कंपनियों की पैकेजिंग के लिए कच्चे माल की बढ़ी कीमतों के कारण लागत पहले ही 15% तक बढ़ चुकी है। Federation of European Business in India का कहना है कि वैकल्पिक सोर्सिंग की तलाश करने पर लागत 30% और बढ़ सकती है। विभिन्न कंपनियों के पी/ई रेश्यो (P/E Ratio TTM) की बात करें तो Pernod Ricard का 11.39, Anheuser-Busch InBev का 20.50, Heineken का 19.65, Carlsberg का -29.19 और Diageo का 17.09 है, जो निवेशकों के नजरिए को दर्शाता है और यह प्रदर्शन जारी रहने पर बदल सकता है।
भू-राजनीति और करेंसी का दबाव
मध्य-पूर्व का संकट पहले से कमजोर सप्लाई चेन को और बिगाड़ रहा है। इम्पोर्टेड एनर्जी और मटेरियल पर निर्भरता, साथ ही अस्थिर भू-राजनीतिक माहौल, सप्लाई में बाधाओं का लगातार जोखिम पैदा करता है। भारत का ग्लास मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर खास तौर पर मध्य-पूर्व से गैस इम्पोर्ट पर निर्भर होने के कारण कमजोर है। इसके अलावा, डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का कमजोर होना भी इम्पोर्टेड पैकेजिंग मटेरियल की लागत बढ़ा रहा है। वर्तमान विनिमय दर लगभग 92.62 INR प्रति 1 USD (9 अप्रैल, 2026 तक) है। यह भू-राजनीतिक अस्थिरता और करेंसी की कमजोरी का मिश्रण एक चुनौतीपूर्ण कारोबारी माहौल बना रहा है।
भारत में संरचनात्मक कमजोरियां
भारत के बेवरेज मार्केट में साल दर साल लगभग 8% की वृद्धि का अनुमान है, लेकिन इसमें बड़ी संरचनात्मक कमजोरियां बनी हुई हैं। लचीली मूल्य निर्धारण वाले बाजारों के विपरीत, भारतीय कंपनियों को राज्य सरकारों से लागत वृद्धि की मंजूरी मिलने में लंबा इंतजार करना पड़ता है। इससे मुनाफा मार्जिन टिकाऊ नहीं रह सकता और कंपनियों को अधिक अनुकूल बाजारों पर ध्यान केंद्रित करना पड़ सकता है। भारतीय रुपये का ऐतिहासिक कमजोर होना बताता है कि करेंसी जोखिम एक स्थायी कारक है। साथ ही, पैकेजिंग उत्पादन की एनर्जी-इंटेंसिव प्रकृति इस सेक्टर को वैश्विक ऊर्जा संघर्षों के किसी भी और बढ़त के प्रति संवेदनशील बनाती है। यदि वर्तमान सप्लाई की कमी जारी रहती है और मूल्य मंजूरी मुश्किल बनी रहती है, तो इस सेक्टर में बीयर और स्पिरिट्स की उपलब्धता में, खासकर गर्मियों की खपत के व्यस्त मौसम में, बड़ी गिरावट देखी जा सकती है।