भारत की प्रमुख बेवरेज कंपनियां अपनी लागत घटाने के लिए अब आक्रामक रूप से 'जीरो-शुगर' प्रोडक्ट्स पर फोकस कर रही हैं। हालांकि इससे वॉल्यूम ग्रोथ तो मिल रही है, लेकिन पैकेजिंग की बढ़ती कीमतों के कारण मार्जिन पर दबाव निवेशकों की चिंता बढ़ा रहा है।
स्ट्रैटेजिक बदलाव और लागत का गणित
भारतीय बेवरेज इंडस्ट्री में इस समय बड़ा बदलाव दिख रहा है। PepsiCo और Coca-Cola जैसी दिग्गज कंपनियां अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को तेजी से बदल रही हैं। Varun Beverages, जो PepsiCo का मुख्य बॉटलिंग पार्टनर है, ने अपनी सेल्स मिक्स में बड़ा बदलाव किया है। कंपनी के अनुसार, साल 2026 की तीसरी तिमाही में जीरो और लो-शुगर वाले प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी कुल सेल्स में 88% तक पहुंच गई है, जो पिछले साल इसी अवधि में महज 44% थी। यह कदम घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में हुई 16% की बढ़ोतरी से बचने की एक बड़ी कोशिश है।
मार्जिन पर दबाव (Margin Pressure)
चीनी पर निर्भरता घटाने के बाद भी कंपनियों की मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। Varun Beverages का EBITDA मार्जिन इस तिमाही में घटकर 21.6% रह गया है, जिसमें 140 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट दर्ज की गई है। इसकी मुख्य वजह एल्युमीनियम और श्रिंक फिल्म जैसे पैकेजिंग मटेरियल की बढ़ती लागत है। वॉल्यूम ग्रोथ तो मजबूत है, लेकिन मुनाफे को बचाए रखने के लिए कंपनियों को अब पैकेजिंग जैसे नॉन-शुगर खर्चों को मैनेज करना होगा।
बढ़ता कंपटीशन
मार्केट में मुकाबला कड़ा होता जा रहा है। Coca-Cola अपने जीरो-शुगर पोर्टफोलियो से ग्लोबल स्तर पर 16% की वॉल्यूम ग्रोथ देख रही है, वहीं हिंदुस्तान कोका-कोला होल्डिंग्स (HCCH) के $10 बिलियन के वैल्यूएशन पर IPO की चर्चा भी बाजार में गरमाई हुई है। दूसरी ओर, Reliance Consumer Products का 'Campa' ब्रांड और Veeba Foods जैसे खिलाड़ी भी हेल्थ-कॉन्शियस ग्राहकों को टारगेट कर इस सेगमेंट को एक नया बैटलफील्ड बना रहे हैं। निवेशकों को अब इन कंपनियों की वॉल्यूम सस्टेनेबिलिटी और पैकेजिंग लागत पर अपनी पैनी नजर रखनी होगी।
