भारत में धार्मिक पर्यटन का क्रेज बढ़ते देख IHCL, ITC और Radisson जैसी बड़ी होटल चेन अब टियर-2 और टियर-3 शहरों में अपना विस्तार कर रही हैं। हालांकि यहां कमरा किराया कम है, लेकिन इन कंपनियों का लक्ष्य भारी भीड़ के जरिए अपनी ब्रांड वैल्यू को मजबूत करना है।
बाजार की बदलती नब्ज
भारत के हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के दिग्गज खिलाड़ी अब महानगरों से निकलकर धार्मिक पर्यटन केंद्रों का रुख कर रहे हैं। IHCL, ITC, Radisson और Wyndham जैसी कंपनियां अयोध्या, वाराणसी और तिरुपति जैसे शहरों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। यह बदलाव इसलिए भी बड़ा है क्योंकि अब कंपनियां हाई-मार्जिन वाले लग्जरी सेगमेंट के बजाय 'वॉल्यूम' यानी ज्यादा ग्राहकों तक अपनी पहुंच बनाने पर जोर दे रही हैं।
क्यों है यह रणनीति अहम?
आंकड़ों के मुताबिक, भारत में डोमेस्टिक टूरिज्म का लगभग 50% हिस्सा अकेले धार्मिक यात्राओं से आता है। इन शहरों में साल भर भीड़ रहती है, जो होटल कंपनियों को अपने 'लॉयल्टी प्रोग्राम्स' और सर्विस स्टैंडर्ड्स को एक बड़े दर्शक वर्ग के सामने पेश करने का मौका देती है।
'एसेट-लाइट' मॉडल का दांव
वित्तीय मोर्चे पर, ये होटल कंपनियां 'एसेट-लाइट' मॉडल अपना रही हैं। इसमें कंपनी जमीन खरीदने या भारी निवेश करने के बजाय स्थानीय मालिकों के साथ मैनेजमेंट कॉन्ट्रैक्ट साइन कर रही है। इससे उन पर भारी कर्ज का बोझ नहीं बढ़ता। हालांकि, निवेशकों के लिए एक बड़ा रिस्क है—टियर-2 और टियर-3 शहरों में ब्रांड स्टैंडर्ड को मेंटेन करना और ऑपरेशनल वेरिएबिलिटी से निपटना।
मार्जिन और प्रॉफिट का गणित
धार्मिक शहरों में होटल के कमरों का औसत किराया (Room Rates) बड़े शहरों के मुकाबले काफी कम होता है, जो कंपनी के नेट प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। इसे संतुलित करने के लिए कंपनियां अब रीजनल शादियों और बिजनेस मीटिंग्स को होस्ट करने पर ध्यान दे रही हैं। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या ये कंपनियां कम किराये के बावजूद मुनाफा बनाए रख पाती हैं, या फिर ज्यादा सप्लाई के चलते यहां प्राइस वॉर शुरू हो सकता है।
