बिहार की एक माँ-बेटे की जोड़ी ने घर पर बने ठेकुआ के बिजनेस को एक अविश्वसनीय मुकाम तक पहुंचाया है। उनके इस देसी ब्रांड का अंदाज़ा **₹75 करोड़** की वैल्यूएशन तक पहुंच गया है। यह ब्रांड रोज़ाना **1,000** से ज़्यादा ऑर्डर संभालता है और सालाना **₹15 करोड़** का रेवेन्यू जेनरेट कर रहा है, जो दिखाता है कि कैसे असली, बिना केमिकल वाले पारंपरिक स्नैक्स की मांग बढ़ रही है।
Detailed Coverage
ठेकुआ कैसे बना करोड़ो का ब्रांड?
पारंपरिक बिहारी ठेकुआ को एक कमर्शियल ब्रांड में बदलना ये दिखाता है कि कैसे क्षेत्रीय स्नैक्स ऑर्गेनाइज्ड फूड मार्केट में अपनी जगह बना रहे हैं। वीणा देवी और उनके बेटे समीर द्वारा शुरू किए गए इस वेंचर ने चार चूल्हों से शुरू होकर आज एक बड़े बिजनेस का रूप ले लिया है, जिसमें प्रोडक्शन और पैकेजिंग के लिए करीब 50 लोग काम करते हैं।
रोज़ाना 1,000 ऑर्डर और ₹15 करोड़ का रेवेन्यू
यह कंपनी अब सालाना लगभग ₹15 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज कर रही है। इसकी वजह रोज़ाना 1,000 से ज़्यादा मिलने वाले ऑर्डर हैं। इस बिजनेस मॉडल की खासियत यह है कि ये ऐसे पारंपरिक स्नैक्स की डिमांड को पूरा करता है जिनमें वो प्रिजर्वेटिव्स (preservatives) नहीं होते जो बड़े पैमाने पर बनने वाले पैक्ड फूड में पाए जाते हैं। खुद को एक हेल्दी, घर जैसे स्वाद वाले विकल्प के तौर पर पेश करके, इस जोड़ी ने एक ऐसा ब्रांड बनाया है जिसकी वैल्यूएशन अब ₹75 करोड़ बताई जा रही है।
फूड इंडस्ट्री के लिए एक नया ट्रेंड
फूड और स्नैक्स इंडस्ट्री के लिए यह कामयाबी एक खास ट्रेंड की ओर इशारा करती है, जहां छोटे, सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े फूड प्रोडक्ट्स अपनी पकड़ बना रहे हैं। बड़े स्नैक्स निर्माताओं के विपरीत, जो भारी मात्रा में और कम लागत पर प्रोडक्शन करते हैं, यह मॉडल ब्रांड की पहचान और घर जैसी तैयारी की क्वालिटी पर फोकस करता है।
निवेशकों की नजरें भी टिकी
कंज्यूमर प्रोडक्ट्स स्पेस में निवेशक अक्सर ऐसे बदलावों पर नज़र रखते हैं। बड़ी FMCG कंपनियाँ भी लोकल या रीजनल प्लेयर्स से मार्केट शेयर छीनने के लिए पारंपरिक स्नैक सेगमेंट में उतरने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे छोटे वेंचर्स की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी कैसे बनाए रखते हैं और जैसे-जैसे वे लोकल से बड़े बाजारों की ओर बढ़ते हैं, तो वे डिस्ट्रीब्यूशन और पैकेजिंग की लॉजिस्टिक्स को कैसे मैनेज करते हैं।
आगे क्या है खास?
इसी तरह के फूड-बेस्ड स्टार्टअप्स के लिए कुछ खास बातें ध्यान रखने वाली हैं: प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ने पर प्रोडक्ट की क्वालिटी को बनाए रखना, शुरुआती ग्राहक बेस से आगे बढ़ते हुए डिस्ट्रीब्यूशन को बढ़ाना और रॉ मैटेरियल्स जैसे आटा, गुड़ और घी की सप्लाई चेन को मैनेज करना। इसके अलावा, इन बिजनेसेस को दूसरी रीजनल कंपनियों और बड़ी FMCG ब्रांड्स से भी मुकाबला करना पड़ता है जो आजकल हेल्दी और विरासत से जुड़े ग्राहकों को लुभाने के लिए 'ऑथेंटिक' या 'ट्रैडिशनल' स्नैक लाइनें लॉन्च कर रहे हैं।
