2025 के फेस्टिव सीजन के बाद से सोने की कीमतों में **54%** का भारी उछाल आया है। इसके चलते भारतीय ग्राहक अब बजट-फ्रेंडली डायमंड ज्वेलरी की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं, जिससे रिटेलर्स को भी अपनी स्ट्रेटजी बदलनी पड़ रही है।
सोने की बढ़ती कीमतों ने भारतीय ज्वेलरी मार्केट का पूरा गणित बदल दिया है। पिछले एक साल में गोल्ड के दाम 54% तक बढ़ चुके हैं, जिससे आम खरीदारों की जेब पर सीधा असर पड़ रहा है। इस बढ़त के कारण, ज्वेलर्स अब भारी-भरकम सोने के गहनों के बजाय डायमंड-जड़ित आभूषणों को बढ़ावा दे रहे हैं, विशेषकर ₹10,000 से ₹1 लाख के बजट वाले 'एंट्री-लेवल लग्जरी' सेगमेंट में, जहाँ 20% की जोरदार डिमांड देखी जा रही है।
लो-कैरेट गोल्ड का नया चलन
कीमतों को कंट्रोल में रखने के लिए ज्वेलर्स अब गहनों की बनावट में तकनीकी बदलाव कर रहे हैं। अब 18-कैरेट, 14-कैरेट और यहाँ तक कि 9-कैरेट गोल्ड बेस का इस्तेमाल बढ़ गया है। इससे ज्वेलर्स कम कीमत में छोटे हीरे जड़कर शानदार डिजाइन तैयार कर रहे हैं। यह रणनीति ग्राहकों को सोने की पूरी कीमत दिए बिना डायमंड का प्रीमियम लुक और चमक देने में सफल रही है।
रिटेलर्स की बदली रणनीति और रिस्क
रिटेलर्स के लिए यह बदलाव सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि बिक्री बनाए रखने की मजबूरी बन गया है। भारी नेकलेस की जगह अब पेंडेंट, ब्रेसलेट और इयररिंग्स पर ज्यादा फोकस है। हालाँकि, यह बदलाव अपने साथ जोखिम भी लाया है:
- प्रॉफिट मार्जिन का दबाव: डायमंड और लो-कैरेट गोल्ड के मिश्रण को बैलेंस करना मार्जिन के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
- इन्वेंटरी का रिस्क: यदि फेस्टिव सीजन के बाद डायमंड ज्वेलरी का क्रेज कम होता है, तो स्टॉक जमा होने का डर बना हुआ है।
- डिमांड वोलेटिलिटी: यदि भविष्य में सोने की कीमतें घटती हैं, तो ग्राहक फिर से पारंपरिक सोने के गहनों की ओर रुख कर सकते हैं, जो मौजूदा सेल्स ट्रेंड को प्रभावित कर सकता है।
