भीषण गर्मी का असर: भारत के गारमेंट सेक्टर में 10% घटी उत्पादकता, कंपनियां अपना रहीं नए तरीके

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AuthorMehul Desai|Published at:
भीषण गर्मी का असर: भारत के गारमेंट सेक्टर में 10% घटी उत्पादकता, कंपनियां अपना रहीं नए तरीके

भारत में बढ़ती गर्मी का कहर गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर साफ़ दिखाई दे रहा है। अत्यधिक तापमान के कारण फैक्ट्रियों की उत्पादकता में **10%** की गिरावट आई है, साथ ही कर्मचारियों की अनुपस्थिति भी बढ़ गई है। इस चुनौती से निपटने के लिए कुछ निर्माता विशेष कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर रहे हैं, जिससे भविष्य में परिचालन लागत और सप्लाई चेन के मानकों पर असर पड़ सकता है।

गर्मी से प्रोडक्शन पर बड़ा झटका

भारत में भीषण गर्मी ने गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी समस्या खड़ी कर दी है। NYU Stern Center for Business and Human Rights की एक रिपोर्ट के मुताबिक, गर्मियों के महीनों में मैन्युफैक्चरर्स की प्रोडक्टिविटी में 10% तक की कमी देखी जा रही है। इसकी मुख्य वजह कर्मचारियों का काम पर कम आना और अत्यधिक गर्मी व उमस के कारण वर्कर्स का सेहत पर पड़ने वाला बुरा असर है।

मॉडर्न कूलिंग सिस्टम पर फोकस

अब कंपनियां सुरक्षित वर्किंग कंडीशन बनाए रखने के लिए फैक्ट्रियों के इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े बदलाव कर रही हैं। ओडिशा में हॉन्ग-कॉन्ग बेस्ड Epic Group का Trimetro कैंपस इसका एक अच्छा उदाहरण है। इस फैसिलिटी में एडवांस्ड थर्मल इंसुलेशन और एक्टिव कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है, जो अंदर का तापमान लगभग 28 डिग्री सेल्सियस बनाए रखता है। इंसुलेटेड रूफिंग और मिट्टी की दीवारों जैसे डिज़ाइन पुराने, गर्म वर्क एनवायरनमेंट की जगह ले रहे हैं, जिनमें वेंटिलेशन की कमी हुआ करती थी।

सप्लाई चेन पर वित्तीय और परिचालन असर

इन अपग्रेड्स का खर्च काफी ज़्यादा है, जिसके लिए लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल प्लानिंग की ज़रूरत पड़ती है। उदाहरण के लिए, IFC ने Epic Group को भारत और बांग्लादेश में ऑपरेशन के लिए $100 मिलियन का डेट फाइनेंसिंग पैकेज दिया है। यह फंड ग्रीनहाउस गैस एमिशन कम करने और मैनेजमेंट में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने जैसे सस्टेनेबिलिटी गोल्स से जुड़ा है। हालांकि, इस तरह के मॉडर्न, क्लाइमेट-कंट्रोल्ड फैसिलिटी में कैपिटल स्पेंडिंग गर्मी से जुड़े रिस्क को कम कर सकती है, लेकिन यह गारमेंट सप्लायर्स की कॉस्ट स्ट्रक्चर को भी बढ़ाती है।

इंडस्ट्री की चुनौतियां और भविष्य

भारत में लाखों लोगों को रोजगार देने वाला अपैरल सेक्टर, क्लाइमेट फैक्टर्स और इंटरनेशनल रेगुलेटरी स्टैंडर्ड्स, दोनों के दबाव में है। HeatWatch और Tata Institute of Social Sciences की एक स्टडी में पाया गया कि ज़्यादातर गारमेंट वर्कर्स ने पिछले साल गर्मी से जुड़ी बीमारियों की शिकायत की थी। अमेरिकन अपैरल एंड फुटवियर एसोसिएशन (American Apparel & Footwear Association) जैसे इंडस्ट्री ग्रुप्स अब ग्लोबल ब्रांड्स से इस बात की मांग कर रहे हैं कि वे लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स के ज़रिए इन वर्कप्लेस इम्प्रूवमेंट्स में मदद करें। निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या ये निवेश शुरूआती लागतों की भरपाई करने वाली हायर ऑपरेशनल एफिशिएंसी लाते हैं। प्रॉफिट मार्जिन पर लॉन्ग-टर्म असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ब्रांड्स इन अनिवार्य वर्कप्लेस सेफ्टी अपग्रेड्स से जुड़ी कुछ लागतों को वहन करने को तैयार हैं या नहीं, या फिर यह खर्च छोटे और कम सुसज्जित मैन्युफैक्चरर्स को मार्केट से बाहर कर देगा।

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