Whey प्रोटीन की बढ़ती कीमतों से निपटने के लिए Hindustan Unilever (HUL) जैसी दिग्गज कंपनियां अब 'फर्मेंटेड यीस्ट प्रोटीन' (Fermented Yeast Protein) की ओर रुख कर रही हैं। इस कदम का मकसद मास मार्केट में सस्ते और सुपाच्य प्रोटीन उत्पादों को उतारना है।
भारत के फूड और न्यूट्रिशन सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पिछले दो वर्षों में Whey प्रोटीन की बढ़ती कीमतों ने कंपनियों की मार्जिन पर तगड़ा दबाव बनाया है, जिसके चलते अब Hindustan Unilever (HUL), Cosmix और The Good Bug जैसी कंपनियां यीस्ट प्रोटीन को अपना रही हैं।
क्यों पड़ रही है बदलाव की जरूरत?
भारत अपनी ज़रूरत का 80% से 85% Whey प्रोटीन इंपोर्ट करता है। इसका मुख्य कारण भारतीय डेयरी इंडस्ट्री का दूध और पारंपरिक उत्पादों पर आधारित होना है, जबकि Whey मुख्य रूप से चीज (Cheese) बनाने के दौरान निकलता है। ग्लोबल मार्केट में कीमतों के उतार-चढ़ाव से घरेलू मैन्युफैक्चरर्स काफी प्रभावित होते हैं।
लागत में बड़ा अंतर
यीस्ट प्रोटीन एक सस्ता विकल्प बनकर उभरा है। जहां अच्छी क्वालिटी के Whey प्रोटीन की लागत ₹2,300 प्रति किलो से अधिक है, वहीं यीस्ट प्रोटीन की लागत ₹700 से ₹800 प्रति किलो के बीच है। यह प्राइस गैप कंपनियों को बेहतर प्रॉफिट मार्जिन देने के साथ ही उन 97% भारतीय परिवारों तक पहुंचने का मौका देता है जो अब तक महंगे प्रोटीन सप्लीमेंट्स से दूर थे।
सेहत और डाइजेशन का कनेक्शन
यीस्ट प्रोटीन का सबसे बड़ा फायदा इसकी डाइजेस्टिबिलिटी (पाचन क्षमता) है। भारत में बड़ी आबादी लैक्टोज इनटोलरेंट है, जिन्हें Whey के सेवन से पेट की समस्याएं होती हैं। HUL अपने मशहूर ब्रांड 'Horlicks' के जरिए इस नए प्रोटीन को जिम सप्लीमेंट के बजाय एक 'एवरीडे डाइट' के रूप में पेश कर रहा है।
निवेशकों के लिए जोखिम (Risks for Investors)
इस बदलाव में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती कंज्यूमर की सोच बदलना है, क्योंकि अभी भी मार्केट में Whey को ही मसल रिकवरी के लिए 'गोल्ड स्टैंडर्ड' माना जाता है। साथ ही, घरेलू स्तर पर यीस्ट प्रोटीन के प्रोडक्शन को स्केल करना और क्वालिटी कंट्रोल बनाए रखना इस बदलाव की सफलता के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा। निवेशकों को नजर रखनी होगी कि कंपनियां कितनी तेजी से इस नए प्रोडक्ट लाइन को बाजार में लोकप्रिय बना पाती हैं।
