दो साल की सुस्ती के बाद ग्लोबल लक्जरी मार्केट अब संभलता दिख रहा है। ग्राहक अब फैशन के बजाय ज्वेलरी और घड़ियों जैसे 'Hard Luxury' को प्राथमिकता दे रहे हैं।
पिछले 2 साल की गिरावट और सुस्त नतीजों के बाद, लक्जरी गुड्स सेक्टर अब स्थिरता की ओर बढ़ रहा है। जो इंडस्ट्री कभी ताबड़तोड़ प्राइस हाइक और बेतहाशा खर्च पर टिकी थी, वह अब एक नए और 'सिलेक्टिव' दौर में प्रवेश कर रही है।
Hard Luxury की चमक बरकरार
बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ज्वेलरी और हाई-एंड घड़ियों जैसे 'Hard Luxury' सेगमेंट ने फैशन और लेदर गुड्स जैसे 'Soft Luxury' के मुकाबले काफी बेहतर प्रदर्शन किया है। Richemont जैसी कंपनियां इसका बड़ा उदाहरण हैं, जिन्होंने फैशन के मुकाबले अधिक मजबूती दिखाई है। ग्राहक अब ऐसी चीजों पर पैसा खर्च करना चाहते हैं जिनकी लॉन्ग-टर्म वैल्यू हो, न कि सिर्फ सीजनल फैशन पर।
प्राइस फटीग का असर (Price Fatigue)
LVMH की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में ऑर्गेनिक रेवेन्यू ग्रोथ मात्र 2% रही है, जो रिकवरी की धीमी रफ्तार को दिखाती है। इसकी बड़ी वजह है 'प्राइस फटीग'। पिछले कुछ सालों में ब्रांड्स ने मार्जिन बढ़ाने के लिए लगातार डबल-डिजिट में कीमतें बढ़ाईं, जिससे आम 'एस्पिरेशनल कंज्यूमर' (आकांक्षी उपभोक्ता) अब बाजार से दूर हो गया है।
भारत में IPO का फीका रिस्पॉन्स
इसका असर भारत में भी दिख रहा है। हाल ही में आए Purple Style Labs (Pernia's Pop-Up Shop) के IPO को लेकर संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) का रुख ठंडा रहा। यह इस बात का संकेत है कि अब निवेशक सिर्फ नाम के भरोसे नहीं, बल्कि वैल्यूएशन और कंपनी की ग्रोथ क्षमता को देखकर ही पैसा लगा रहे हैं।
आगे क्या रहेगा रिस्क?
सेक्टर तो संभल रहा है, लेकिन चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। चीन की डिमांड, ग्लोबल जियो-पॉलिटिकल तनाव और ब्रांड्स के पास जमा भारी इन्वेंट्री (Inventory) मुनाफे पर दबाव डाल सकते हैं। अगर ब्रांड्स को स्टॉक क्लीयर करने के लिए डिस्काउंट देना पड़ा, तो उनके मार्जिन और भी गिर सकते हैं। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि कंपनियां बिना कीमतें बढ़ाए सेल्स को कैसे स्टेबल रखती हैं।
