भारतीय फ़ूड कंपनियां अब अपने प्रोडक्ट्स में प्रिजर्वेटिव्स (preservatives) का इस्तेमाल कम कर रही हैं। इसकी वजह है कंज्यूमर्स की हेल्थ-कॉन्शियस (health-conscious) डिमांड। इस ट्रेंड को पूरा करने के लिए कंपनियां एडवांस पैकेजिंग टेक्नोलॉजी (advanced packaging technology) में भारी निवेश कर रही हैं। लेकिन इस बदलाव से प्रोडक्शन कॉस्ट (production cost) बढ़ रही है, जिसमें पैकेजिंग का खर्च डेयरी और बेवरेज (beverage) कंपनियों के लिए कुल प्रोडक्ट कॉस्ट का 50% तक पहुंच रहा है।
नई पैकेजिंग की ओर भारतीय फ़ूड कंपनियाँ
कंज्यूमर्स के बीच 'क्लीन-लेबल' (clean-label) और प्रिजर्वेटिव-फ्री (preservative-free) खाने की मांग तेजी से बढ़ रही है। लोग अब इंग्रेडिएंट लिस्ट (ingredient list) को ध्यान से देख रहे हैं, जिसके चलते फ़ूड मैन्युफैक्चरर्स (manufacturers) केमिकल एडिटिव्स (chemical additives) पर निर्भर हुए बिना प्रोडक्ट की फ्रेशनेस (freshness) और क्वालिटी बनाए रखने के लिए नई पैकेजिंग टेक्नोलॉजी अपना रहे हैं। इस बदलाव के लिए रिसर्च (research) और नए मटेरियल्स (materials) में बड़ा इन्वेस्टमेंट (investment) करना पड़ रहा है, जो अब प्रोडक्ट की सिर्फ सुरक्षा से कहीं आगे बढ़कर एक अहम बिजनेस स्ट्रैटेजी (business strategy) बन गया है।
एडवांस्ड पैकेजिंग मटेरियल्स की ओर बढ़ता कदम
केमिकल प्रिजर्वेटिव्स के बिना खाने को फ्रेश रखने के लिए कंपनियाँ नाइट्रोजन फ्लशिंग (nitrogen flushing) जैसी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही हैं, जिसमें पैक्स (packs) के अंदर की ऑक्सीजन को इनर्ट नाइट्रोजन (inert nitrogen) से बदल दिया जाता है ताकि स्पॉइलेज (spoilage) को रोका जा सके। इसके अलावा, मल्टी-लेयर बैरियर फिल्म्स (multi-layer barrier films) और मोनो-मटेरियल रिसाइक्लेबल लैमिनेट्स (mono-material recyclable laminates) का इस्तेमाल बढ़ रहा है, जो नमी (moisture) और ऑक्सीजन से बेहतर सुरक्षा देते हैं। अक्षय कल्प ऑर्गेनिक (Akshayakalpa Organic) जैसी डेयरी कंपनियाँ पेपरबोर्ड पैकेजिंग (paperboard packaging) की ओर बढ़ रही हैं, जबकि कई कंपनियाँ नए मटेरियल्स की टेस्टिंग के लिए रिसर्च पर खर्च बढ़ा रही हैं। आपको बता दें कि Khetika, जिसे Anicut Capital का सपोर्ट हासिल है, ने पिछले तीन सालों में ऐसे इनिशिएटिव्स (initiatives) पर अपने R&D खर्च (R&D spending) को लगभग 50% तक बढ़ाया है, ताकि इंडिया की कॉम्प्लेक्स सप्लाई चेन (supply chain) को बेहतर ढंग से मैनेज किया जा सके।
प्रॉफिट मार्जिन और कॉस्ट पर असर
इस स्ट्रेटेजिक (strategic) बदलाव का सीधा असर कंपनी के फाइनेंस (finance) पर भी पड़ रहा है। एडवांस्ड पैकेजिंग सोल्यूशंस (solutions) की वजह से प्रति यूनिट कॉस्ट (cost per unit) पारंपरिक तरीकों की तुलना में 30% से 60% तक बढ़ सकती है। फ़ूड इंडस्ट्री में, जहां पैकेजिंग पहले से ही कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा होती है (आमतौर पर 10% से 40% तक, और डेयरी व बेवरेज के लिए 50% तक), यह अतिरिक्त खर्च प्रॉफिट मार्जिन (profit margins) पर दबाव डाल सकता है। कंपनियों को इन खर्चों को हेल्थ-फोकस्ड (health-focused) और प्रीमियम प्रोडक्ट्स (premium products) के लिए ज्यादा कीमत वसूलने की क्षमता के साथ बैलेंस करना होगा।
कॉम्पिटिटिव एडवांटेज (Competitive Advantage) और मार्केट रीच (Market Reach)
ITC Ltd जैसी बड़ी इंटीग्रेटेड (integrated) कंपनियों के लिए, जिनका अपना पेपरबोर्ड और पैकेजिंग बिजनेस (packaging business) है, यह एक बड़ा कॉम्पिटिटिव एज (advantage) है। वे छोटे ब्रांड्स की तुलना में नए पैकेजिंग डिज़ाइन्स (designs) का तेजी से टेस्ट और डेवलपमेंट कर पाते हैं, जो पूरी तरह से थर्ड-पार्टी सप्लायर्स (suppliers) पर निर्भर होते हैं। इसके अलावा, विजुअल डिज़ाइन (visual design) भी मार्केट में एक अहम भूमिका निभा रहा है। मिनिमलिस्ट पैकेजिंग (minimalist packaging) और क्लीन टाइपोग्राफी (clean typography) का इस्तेमाल इंग्रेडिएंट ट्रांसपेरेंसी (ingredient transparency) को दर्शाता है, जो Flipkart जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स (e-commerce platforms) पर सेल्स बढ़ाने में काफी कारगर है। इन ब्रांड्स के लिए, पैकेजिंग प्रीमियम पोजीशनिंग (premium positioning) का एक अहम जरिया है, लेकिन सफलता के लिए सेल्स वॉल्यूम (sales volumes) को बनाए रखना जरूरी है ताकि बढ़ी हुई फिक्स्ड कॉस्ट (fixed costs) को कवर किया जा सके।
इन्वेस्टर्स (Investors) यह मॉनिटर (monitor) कर सकते हैं कि कंपनियाँ इन बढ़ी हुई पैकेजिंग कॉस्ट्स (costs) को कंज्यूमर्स पर थोपने में कामयाब होती हैं या नहीं, या फिर ये खर्च लंबे समय तक प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित करेंगे। ब्रांड लॉयल्टी (brand loyalty) बनाए रखने के साथ-साथ बढ़ते ऑपरेशनल कॉस्ट्स (operational costs) को मैनेज करना, पैक्ड फ़ूड (packaged food) और डेयरी सेक्टर (dairy sectors) की आने वाली तिमाही नतीजों (quarterly results) में ट्रैक करने लायक एक अहम फैक्टर होगा।
