FSSAI अब पैक्ड फूड आइटम्स पर लाल रंग के हेक्सागोनल वार्निंग लेबल को अनिवार्य करने की तैयारी में है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे लागू करने की समयसीमा को 'अतार्किक' बताया है, जिससे निवेशकों और FMCG कंपनियों के बीच अनिश्चितता बढ़ गई है।
भारत के फूड रेगुलेटर FSSAI ने पैक्ड फूड के लिए एक बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया है। जो खाद्य पदार्थ चीनी, फैट या नमक की तय सीमा से ज्यादा मात्रा रखते हैं, उन पर अब सफेद बैकग्राउंड के साथ 'रेड हेक्सागोनल लेबल' लगाना अनिवार्य होगा। इसका मकसद ग्राहकों को स्वास्थ्य के प्रति सचेत करना है, लेकिन फिलहाल यह मामला कानूनी पचड़े में फंसा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और रेगुलेटरी अड़चन
सितंबर 2026 के अंत में रेगुलेटर ने सुप्रीम कोर्ट में एक संशोधित हलफनामा दायर किया है, जिसमें सिंगल-फेज लागू करने की बात कही गई है। यानी अगर किसी प्रोडक्ट में चीनी, फैट या नमक में से कोई भी एक पोषक तत्व तय सीमा पार करता है, तो रेड लेबल अनिवार्य होगा। कोर्ट ने इस प्रस्ताव की समयसीमा को लेकर अपनी असहमति जताई है, जिससे पूरा मामला फिलहाल कोर्ट के फैसले पर टिका है।
इंडस्ट्री की आपत्तियां और चिंताएं
All India Food Processors Association सहित कई इंडस्ट्री बॉडीज ने इसका विरोध किया है। सबसे बड़ी चिंता 'लाल रंग' के इस्तेमाल को लेकर है। कंपनियों का तर्क है कि ग्राहक इसे शाकाहारी और मांसाहारी उत्पादों के लिए इस्तेमाल होने वाले मौजूदा ब्राउन और ग्रीन डॉट से कन्फ्यूज हो सकते हैं। इसके अलावा, कंपनियां 100 ग्राम के मानक के बजाय 'सर्विंग साइज' (Serving Size) के आधार पर मानदंड तय करने की मांग कर रही हैं, ताकि प्रोडक्ट को गलत तरीके से 'अनहेल्दी' न माना जाए।
निवेशकों के लिए सबक (Investor Perspective)
निवेशकों को इस बदलाव के असर को गंभीरता से लेने की जरूरत है। यदि किसी प्रोडक्ट पर रेड लेबल लगता है, तो उसकी सेल्स वॉल्यूम और ब्रांड इमेज पर सीधा असर पड़ सकता है। कंपनियों को अपनी आरएंडडी (R&D) लागत बढ़ानी पड़ सकती है ताकि वे पोषक तत्वों को कम कर लेबल से बच सकें। FMCG सेक्टर में यह नियम आने वाले समय में प्रॉफिट मार्जिन और मार्केट शेयर के गणित को बदल सकता है, इसलिए कोर्ट के अगले आदेशों पर नजर रखना बेहद जरूरी है।
