FSSAI ने अब गैर-डेयरी (non-dairy) प्रोडक्ट्स के लिए 'paneer' नाम का इस्तेमाल रोकने के लिए कड़े ड्राफ्ट नियम जारी किए हैं। इस फैसले से सिंथेटिक पनीर बनाने वाली कंपनियों को बड़ा झटका लगेगा और ऑर्गेनाइज्ड डेयरी कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ने की उम्मीद है।
नकली पनीर पर लगाम की तैयारी
FSSAI ने सितंबर 2026 के अंत में एक नया ड्राफ्ट जारी किया है, जिसके तहत वेजिटेबल-फैट आधारित प्रोडक्ट्स को 'पनीर' नहीं कहा जा सकेगा। गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में पहले से लागू पाबंदी के बाद, अब पूरे देश में नियम सख्त होने जा रहे हैं। कंपनियों को अब अपने प्रोडक्ट्स पर साफ तौर पर 'नॉन-डेयरी' लिखना अनिवार्य होगा, वरना उन्हें मार्केट से बाहर होना पड़ सकता है।
ऑर्गेनाइज्ड डेयरी सेक्टर के लिए बड़ी खबर
भारत का पैक्ड पनीर मार्केट करीब ₹12,000 करोड़ का है, जबकि ₹30,000 करोड़ का बड़ा हिस्सा अभी भी असंगठित (unorganized) मार्केट के पास है। जैसे-जैसे छोटे और सिंथेटिक खिलाड़ी मार्केट से बाहर होंगे, इसका सीधा फायदा बड़ी और ऑर्गेनाइज्ड कंपनियों को होगा।
उदाहरण के तौर पर, Parag Milk Foods ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी बढ़ाने के लिए ₹100 करोड़ का निवेश किया है। कंपनी का लक्ष्य 2027 के मध्य तक 80 मीट्रिक टन प्रतिदिन का प्रोडक्शन हासिल करना है।
मुनाफा और लागत की चुनौती
हालाँकि, यह खबर पॉजिटिव है, लेकिन निवेशकों को लागत (input cost) के मोर्चे पर सतर्क रहना होगा। दूध की कीमतों में साल-दर-साल 13% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अगर कंपनियां बढ़ती लागत का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पाईं, तो उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, कैपेसिटी एक्सपेंशन में देरी या सेल्स टारगेट न पूरा हो पाना भी एक बड़ी रिस्क है।
