FSSAI अब स्कूलों के **50 मीटर** के दायरे में हाई-फैट, साल्ट और शुगर (HFSS) वाले प्रोडक्ट्स की बिक्री पर रोक लगाने की तैयारी कर रही है। इस फैसले से Nestlé, Coca-Cola और PepsiCo जैसी बड़ी FMCG कंपनियों की बिक्री और मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
भारत के फूड रेगुलेटर FSSAI ने एक बड़ा प्रस्ताव पेश किया है, जिसके तहत देश भर के 15 लाख स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में HFSS (हाई फैट, साल्ट और शुगर) वाले स्नैक्स और ड्रिंक्स की बिक्री को प्रतिबंधित करने की योजना है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य बच्चों में बढ़ते मोटापे को रोकना और खान-पान के स्तर को सुधारना है।
FMCG कंपनियों के लिए क्या है चुनौती?
यह फैसला केवल डिस्ट्रीब्यूशन तक सीमित नहीं है। PepsiCo, Coca-Cola, Mondelez और Nestlé जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए स्कूलों के पास होने वाली सेल वॉल्यूम ग्रोथ का एक बड़ा जरिया है। रेगुलेटर इन प्रोडक्ट्स पर 'रेड वार्निंग लेबल' लगाने पर भी विचार कर रहा है। कंपनियों के सामने दो रास्ते होंगे: या तो वे स्कूलों के पास अपनी पहुंच छोड़ दें, या फिर अपने प्रोडक्ट्स को दोबारा फॉर्म्युलेट (Reformulation) करें ताकि वे 'हेल्दी' कैटेगरी में आ सकें।
मार्जिन पर पड़ सकता है दबाव
प्रोडक्ट्स को दोबारा बनाने की प्रक्रिया काफी महंगी होती है। अगर कंपनियां स्वाद और क्वालिटी से समझौता किए बिना सामग्री बदलती हैं, तो उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर उनके प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ेगा। वहीं, अगर वे इसे नहीं बदलती हैं, तो उन्हें मार्केट शेयर और वॉल्यूम का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
रिटेल और निवेश के नजरिए से
महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पहले से ही इस तरह की पाबंदियां देखी गई हैं। छोटे दुकानदारों की आजीविका भी इस पर निर्भर है, इसलिए इसे लागू करने की गति और HFSS की अंतिम परिभाषा निवेशकों के लिए सबसे बड़े 'मॉनिटरेबल्स' होंगे। चिली जैसे देशों में भी ऐसे सख्त नियम लागू किए गए थे, जिसके बाद वहां की फूड इंडस्ट्री में बड़े संरचनात्मक बदलाव देखने को मिले थे।
