भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने अब फूड और बेवरेज इंडस्ट्री में प्रोडक्ट लेबलिंग और डिजिटल मार्केटिंग के तरीकों की कड़ी समीक्षा शुरू कर दी है। खास तौर पर 'नो एडेड शुगर' (No Added Sugar) या '100% नेचुरल' (100% Natural) जैसे भ्रामक दावों पर नकेल कसी जा रही है।
Detailed Coverage
भ्रामक दावों पर FSSAI की पैनी नजर
FSSAI ने पाया है कि हेल्थ-फूड्स के कई डिजिटल विज्ञापन और प्रोडक्ट लेबल पर किए गए दावे तय मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। अथॉरिटी अब ऐसे शब्दों पर खासतौर पर ध्यान दे रही है जो ग्राहकों को भ्रमित कर सकते हैं, जैसे 'हेल्दी', 'नो एडेड शुगर', 'प्रोटीन-पैक्ड' और '100% नेचुरल'।
कंपनियों पर बढ़ेगा दबाव
कंपनियों को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि पैकेजिंग और मार्केटिंग सामग्री पर किए गए दावे फूड सेफ्टी के नियमों के अनुसार हों। हाल ही में 'The Whole Truth' जैसे डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर ब्रांड को भी लेबल बदलने के निर्देश मिले, क्योंकि वे 'नो एडेड शुगर' का इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि प्रोडक्ट में डेट सिरप या फ्रूट कॉन्संट्रेट जैसे स्वीटनर मौजूद थे। यह साफ दिखाता है कि FSSAI सिर्फ ऊपरी दावों पर नहीं, बल्कि प्रोडक्ट की असल न्यूट्रिशनल वैल्यू पर भी गौर कर रहा है।
हेल्थ-फूड सेक्टर की चुनौतियां
भारत में हेल्थ और न्यूट्रिशन सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, जिसमें 2021 से जुलाई 2026 के बीच ₹761 मिलियन से ज्यादा का वेंचर कैपिटल निवेश आ चुका है। TruNativ, The Whole Truth और Open Secret जैसे कई नए ब्रांड इस फंड से आगे बढ़े हैं। हालांकि, बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच कुछ कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए आक्रामक मार्केटिंग का सहारा ले रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि 'नो एडेड शुगर' का मतलब अक्सर सिर्फ रिफाइंड चीनी का न होना होता है, जबकि प्रोडक्ट में कैलोरी की मात्रा अन्य स्वीटनर्स से काफी हो सकती है। इसी तरह, प्रोटीन के दावों को अक्सर एक सर्विंग के आधार पर दिखाया जाता है, जो दैनिक जरूरत के हिसाब से बहुत ज्यादा नहीं होता। FSSAI की फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर जोर देने का मकसद इन डिस्क्लोजर में ज्यादा पारदर्शिता लाना है।
आगे क्या होगा?
इस सेक्टर की कंपनियों के लिए रेगुलेटरी माहौल सख्त होता जा रहा है। अब हेल्थ क्लेम को साबित करने का दबाव बढ़ेगा, जिससे ब्रांड्स को मार्केटिंग के शोर-शराबे से हटकर रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में ज्यादा निवेश करना पड़ सकता है। निवेशकों को यह देखना होगा कि ये रेगुलेटरी कदम प्रोडक्ट इनोवेशन को कैसे प्रभावित करते हैं। उन कंपनियों को फायदा हो सकता है जो असली पोषण मूल्य पर ध्यान देंगी, बजाय कि भ्रामक मार्केटिंग टैक्टिक्स पर निर्भर रहने वाली कंपनियों के। अंततः, प्रोडक्ट को री-फॉर्म्युलेट करने और नए नियमों के अनुसार ब्रांडिंग मटेरियल अपडेट करने की लागत कंपनी की प्रॉफिटेबिलिटी पर असर डाल सकती है।
