देश के फूड रेगुलेटर FSSAI ने बड़ी वैश्विक खाद्य और बेवरेज कंपनियों के खिलाफ एक सख्त जांच अभियान छेड़ दिया है। हाइजीन और लेबलिंग नियमों में गड़बड़ी के कारण सेक्टर में हड़कंप है, जिससे कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत के खाद्य नियामक, FSSAI ने देश भर में अपनी निगरानी को काफी कड़ा कर दिया है। एक जारी प्रवर्तन अभियान (enforcement drive) के तहत रेगुलेटर ने अब तक घरेलू और वैश्विक स्तर की बड़ी खाद्य कंपनियों को 150 से ज्यादा नोटिस जारी किए हैं। यह कार्रवाई मुख्य रूप से भ्रामक विज्ञापन, हाइजीन मानकों की अनदेखी और लेबलिंग नियमों के उल्लंघन से जुड़ी है।\n\nजांच के दायरे में Nestlé India, PepsiCo, Coca-Cola India, Mondelez और Abbott India जैसी कंपनियां हैं। इसके अलावा, Domino's, McDonald's, KFC, Pizza Hut और Costa Coffee जैसी बड़ी रेस्टोरेंट चेन भी रेगुलेटर की नजर में हैं। रेगुलेटर ने सिर्फ नोटिस तक सीमित न रहकर कुछ आउटलेट्स और गोदामों के लाइसेंस भी सस्पेंड किए हैं।\n\n### चेतावनी लेबल का असर\n\nइस सख्ती के बीच सबसे बड़ा विवाद 'फ्रंट-ऑफ-पैक' पर अनिवार्य 'लाल हेक्सागोनल' चेतावनी लेबल लगाने को लेकर है। ये लेबल उन उत्पादों पर लगाए जाएंगे जिनमें चीनी, फैट या नमक की मात्रा तय सीमा से अधिक होगी। उद्योग जगत का मानना है कि इससे ग्राहकों की मांग पर सीधा असर पड़ सकता है, जिससे ब्रांड वैल्यू और सेल्स गिर सकती है। फिलहाल, यह मामला भारत के सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और वहां से आने वाला फैसला इस सेक्टर के लिए एक बड़ा नजीर साबित होगा।\n\n### ऑपरेशनल और फाइनेंशियल रिस्क\n\nनिवेशकों के लिए यह माहौल अनिश्चितता पैदा करता है। अनुपालन (compliance) की लागत बढ़ने से कंपनियों का पैसा मार्केटिंग और विस्तार की जगह ऑडिट, पैकेजिंग डिजाइन और प्रोडक्ट रिफॉर्मूलेशन में खर्च होगा। इसके अलावा, लाइसेंस सस्पेंशन और प्रोडक्ट सीजर से सेल्स में गिरावट और ब्रांड इमेज को नुकसान पहुंचने का जोखिम भी बरकरार है। कंपनियां अब अपने विज्ञापनों से '100% नेचुरल' या 'शुद्ध' जैसे दावों को हटा रही हैं। आगामी क्वार्टरली रिजल्ट्स में कंपनियों के कानूनी और कंप्लायंस खर्च पर नजर रखना निवेशकों के लिए बेहद जरूरी है।
