FMCG कंपनियों का भारत में बढ़ा निवेश: डिमांड में तेज़ी का बड़ा असर

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
FMCG कंपनियों का भारत में बढ़ा निवेश: डिमांड में तेज़ी का बड़ा असर

यूनिलिवर, नेस्ले और मोंडेलेज जैसी ग्लोबल कंज्यूमर गुड्स (FMCG) कंपनियां भारत में अपना निवेश बढ़ा रही हैं। हाल ही में बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के बाद, ये कंपनियां अफोर्डेबल और प्रीमियम दोनों सेगमेंट में ग्रोथ का फायदा उठाने के लिए डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और डिजिटल सेल्स चैनल का विस्तार कर रही हैं। यह कदम जून तिमाही के दमदार नतीजों के बाद आया है, जिसमें कई कंपनियों ने डबल-डिजिट सेल्स ग्रोथ दर्ज की है।

भारत में निवेश क्यों बढ़ा रहे हैं ये ग्लोबल ब्रांड्स?

यूनिलिवर, नेस्ले, मोंडेलेज, लॉरियल और रेकिट जैसी बड़ी कंज्यूमर गुड्स (FMCG) कंपनियां भारत को अपनी लॉन्ग-टर्म ग्रोथ का अहम हिस्सा मान रही हैं। कंज्यूमर कॉन्फिडेंस (Consumer Confidence) में लगातार तेज़ी और अपने प्रोडक्ट्स की मजबूत परफॉरमेंस को देखते हुए ये मल्टीनेशनल कंपनियां अपने निवेश प्लान को तेज़ी से आगे बढ़ा रही हैं।

मार्केट में पैठ बढ़ाने की रणनीति

बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ये कंपनियां कई तरह की स्ट्रेटेजी अपना रही हैं। मोंडेलेज इंटरनेशनल (Cadbury की पैरेंट कंपनी) ने अपने रिटेल नेटवर्क में 100,000 नए स्टोर जोड़े हैं। कंपनी का मानना ​​है कि भारत उभरते बाजारों में कंज्यूमर कॉन्फिडेंस के मामले में सबसे आगे है। वहीं, लॉरियल ने जून तिमाही में अपने ब्यूटी प्रोडक्ट्स बिजनेस में 70% से अधिक की ग्रोथ दर्ज की है, जिसका बड़ा श्रेय डिजिटल और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स को जाता है।

रेकिट (Dettol, Harpic जैसे ब्रांड्स की कंपनी) ने ऑटोमेटेड सेल्स टूल्स और बेहतर डिस्ट्रीब्यूशन के दम पर हाई सिंगल-डिजिट ग्रोथ हासिल की है। इन कंपनियों का मुख्य मकसद अपने प्रोडक्ट्स को छोटे किराना स्टोर से लेकर बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स तक हर जगह उपलब्ध कराना है, ताकि वे अपनी मार्केट शेयर (Market Share) बढ़ा सकें या बनाए रख सकें।

नतीजों का असर और स्थानीय प्रभाव

इन ग्लोबल स्ट्रेटेजी का असर भारतीय सब्सिडियरी कंपनियों के नतीजों पर भी दिख रहा है। हिंदुस्तान यूनिलिवर लिमिटेड (HUL) ने जून तिमाही में 10% की ग्रोथ के साथ ₹17,184 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज किया, वहीं वॉल्यूम ग्रोथ 5% रही। नेस्ले इंडिया का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट पिछले साल के मुकाबले 48.26% बढ़कर ₹958.68 करोड़ हो गया, जबकि सेल्स में 25.4% की बढ़त के साथ यह ₹6,363.27 करोड़ रही।

हालांकि, ये कंपनियां लॉन्ग-टर्म एक्सपेंशन पर बड़ा दांव लगा रही हैं, लेकिन निवेशकों की नज़र इस बात पर भी रहेगी कि डिस्ट्रीब्यूशन और ब्रांडिंग पर होने वाला यह भारी खर्च प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) को कैसे प्रभावित करता है, खासकर अगर कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आता है। कोका-कोला और पेप्सीको जैसी कंपनियां अफोर्डेबल एंट्री-लेवल प्रोडक्ट्स और प्रीमियम प्रोडक्ट्स दोनों में निवेश को संतुलित कर रही हैं, ताकि हर तरह के कंज्यूमर तक पहुंचा जा सके।

निवेशकों के लिए आगे क्या?

आने वाले समय में, इन कंपनियों की एक्सपेंशन स्ट्रेटेजी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कॉम्पिटिशन (Competition) के माहौल में वॉल्यूम ग्रोथ को कैसे बनाए रखती हैं। निवेशक यह देखना चाहेंगे कि इन निवेशों का मार्जिन पर कितना असर पड़ता है और क्या डिमांड महंगाई के दबाव के बावजूद बनी रहती है। सप्लाई चेन की लागतों को मैनेज करना और डिस्ट्रीब्यूशन को बढ़ाना आने वाली तिमाहियों में इन FMCG कंपनियों के लिए एक अहम फैक्टर रहेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.