बड़ी FMCG कंपनियां अब प्रोटीन स्नैक्स को किफायती और छोटे पैकेट में लॉन्च कर रही हैं। आम जनता तक पहुंच बनाने की इस रणनीति से वॉल्यूम ग्रोथ तो बढ़ सकती है, लेकिन बढ़ती लागत के बीच प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव का जोखिम बना हुआ है।
भारतीय FMCG कंपनियां अब प्रोटीन बेचने के तरीके को पूरी तरह बदल रही हैं। अब प्रीमियम और बड़े सप्लीमेंट पैक्स के बजाय, कंपनियां छोटे और बजट-फ्रेंडली फॉर्मेट पर दांव लगा रही हैं। इसका मकसद प्रोटीन को केवल फिटनेस स्टोर्स तक सीमित न रखकर लोकल रिटेल मार्केट तक पहुंचाना है।
कंपनियों की नई रणनीति
आईटीसी (ITC) ने पूर्वी बाजारों में ₹10 का 'चना सत्तू' लॉन्च किया है, जिसमें 10 ग्राम प्रोटीन मिलता है। इसी तरह, Zydus Wellness ने ₹70 की रेंज में मिलेट-बेस्ड प्रोटीन वेफर्स और Parag Milk Foods ने ₹100 से कम कीमत वाले स्नैकिंग प्रोडक्ट्स पेश किए हैं। कंपनियां इसे वर्कआउट के बाद की डाइट के बजाय, रोजमर्रा के खानपान का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही हैं।
निवेशकों के लिए क्यों जरूरी?
मार्केट डेटा के मुताबिक, अप्रैल 2026 के बाद से छोटे पैक की बिक्री, बड़े पैक्स के मुकाबले 4% से 10% तेजी से बढ़ रही है। महंगाई के दौर में ग्राहक छोटे यूनिट्स को तरजीह दे रहे हैं। हालांकि, कंपनियों के लिए यह चुनौती भी है। छोटे पैक की पैकेजिंग पर खर्च ज्यादा आता है और बढ़ते कमोडिटी व लॉजिस्टिक खर्चों के बीच ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
आगे क्या होगा?
हालांकि ये छोटे पैक वॉल्यूम बढ़ाने में मदद करेंगे, लेकिन निवेशकों को आगामी तिमाही नतीजों पर नजर रखनी होगी कि क्या ये बिक्री कंपनी के मुनाफे (Profitability) को सहारा दे पा रही है या नहीं। आने वाले समय में D2C ब्रांड्स और बड़ी कंपनियों के बीच मुकाबला और कड़ा होने वाला है, जहां डिस्ट्रीब्यूशन और लागत प्रबंधन ही असली अंतर पैदा करेगा।
