FMCG Sector: महंगाई और कड़े नियमों के बीच FMCG कंपनियों ने बढ़ाई मार्केटिंग पर खर्च की रफ्तार

CONSUMER-PRODUCTS
Whalesbook Logo
AuthorMehul Desai|Published at:
FMCG Sector: महंगाई और कड़े नियमों के बीच FMCG कंपनियों ने बढ़ाई मार्केटिंग पर खर्च की रफ्तार

बाजार में अपनी हिस्सेदारी बचाने के लिए बड़ी FMCG कंपनियां मार्केटिंग और विज्ञापन बजट को आक्रामक रूप से बढ़ा रही हैं। महंगाई और FSSAI की सख्ती के बीच कंपनियों का ध्यान अब प्रोडक्ट की पारदर्शिता और सुरक्षा पर है, जिसका सीधा असर मुनाफे पर पड़ सकता है।

भारत में एफएमसीजी (FMCG) कंपनियां अब डिफेंसिव मोड में आ गई हैं। सितंबर में खुदरा खाद्य महंगाई दर के 7.74% तक पहुंचने के बावजूद, ये कंपनियां अपने मुनाफे की चिंता किए बिना ग्राहकों को जोड़े रखने के लिए विज्ञापन पर जमकर पैसा खर्च कर रही हैं। यह रणनीति साफ दर्शाती है कि कंपनियां अभी कमाई के बजाय अपनी ब्रांड वैल्यू और मार्केट शेयर को प्राथमिकता दे रही हैं, जबकि कच्चा माल और लॉजिस्टिक्स की लागत पहले से ही कंपनियों पर भारी पड़ रही है।

नेस्ले इंडिया का उदाहरण

वित्तीय आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि कंपनियों का विज्ञापन खर्च किस तेजी से बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, Nestle India ने सितंबर तिमाही में अपने विज्ञापन खर्च में सालाना आधार पर 46% की भारी बढ़ोतरी की है, जबकि कंपनी की रेवेन्यू ग्रोथ 20.5% रही। जब विज्ञापन पर खर्च रेवेन्यू से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ता है, तो इसका सीधा दबाव ऑपरेटिंग मार्जिन पर पड़ता है। निवेशकों के लिए चुनौती यह है कि अगर यह खर्च बिक्री की मात्रा (Volume) में तब्दील नहीं हुआ, तो भविष्य में कंपनी के मुनाफे पर बड़ा असर पड़ सकता है।

रेगुलेटरी दबाव और बदलती रणनीति

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने हाल ही में बड़ी कंपनियों को प्रोडक्ट लेबलिंग और मार्केटिंग दावों को लेकर 150 से ज्यादा नोटिस जारी किए हैं। इस नियामक सख्ती के चलते कंपनियां अब लाइफस्टाइल-आधारित विज्ञापनों को छोड़कर सीधे प्रोडक्ट की शुद्धता और सुरक्षा पर जोर दे रही हैं।

डिजिटल मार्केटिंग की ओर बढ़ता रुख

मार्केटिंग के तरीके में भी बड़ा बदलाव आया है। अब कंपनियां टीवी के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और इन्फ्लुएंसर-लेड कैंपेन पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रही हैं। साल 2026 के फेस्टिव सीजन के लिए अनुमान है कि इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग का खर्च बढ़कर ₹900 करोड़ हो जाएगा, जो पिछले साल के मुकाबले 29% ज्यादा है।

निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या यह बढ़ता खर्च लंबी अवधि में वॉल्यूम ग्रोथ दिला पाएगा, या फिर महंगाई और ऊंचे विज्ञापन खर्च के बीच कंपनियां मार्जिन के दबाव से जूझती रहेंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.