दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता में खर्च का ट्रेंड पूरी तरह बदल गया है। छोटे ट्रेडर्स के मुकाबले मॉल्स में फुटफॉल **17%** बढ़ा है। बड़े रिटेलर्स और ई-कॉमर्स के हावी होने से एमएसएमई (MSME) सेक्टर पर दबाव बढ़ रहा है, जिस पर निवेशकों को नजर रखनी चाहिए।
बाजार का बदलता मिजाज
कोलकाता की दुर्गा पूजा में इस साल कंज्यूमर बिहेवियर में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। लोग अब स्थानीय और पारंपरिक बाजारों के बजाय मॉल्स और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि मॉल्स में पिछले साल के मुकाबले 17% अधिक फुटफॉल दर्ज किया गया है। इसके पीछे की बड़ी वजह बड़ी रिटेल चेन की आक्रामक मार्केटिंग, बेहतर स्टॉक और तगड़े डिस्काउंट्स हैं।
विज्ञापन बाजार में बड़ी असमानता
त्योहारी सीजन का विज्ञापन बजट भी अब सिमट रहा है। प्रीमियम एरिया जैसे पार्क स्ट्रीट और कैमैक स्ट्रीट पर एडवरटाइजिंग रेट्स 20% से ज्यादा बढ़ गए हैं। वहीं दूसरी ओर, छोटे सामुदायिक आयोजनों में स्पॉन्सरशिप का टोटा है, जिसके चलते वहां करीब 30% विज्ञापन स्पेस खाली पड़ा रहा। यह साफ संकेत है कि बड़े खिलाड़ी ही अब ग्राहकों और रेवेन्यू पर अपना कब्जा जमा पा रहे हैं।
पारंपरिक बाजारों पर संकट
बुराबजार और हाटीबागन जैसे पारंपरिक व्यापारिक केंद्र, जो कभी कोलकाता के कॉमर्स की रीढ़ थे, अब दबाव में हैं। ई-कॉमर्स कंपनियों की ओर से मिल रही भारी सब्सिडी के सामने छोटे दुकानदार टिक नहीं पा रहे हैं, जिससे उनका प्रॉफिट मार्जिन लगातार घट रहा है।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
संगठित रिटेल कंपनियों और बड़े कंज्यूमर ब्रांड्स के तिमाही नतीजों में शानदार रेवेन्यू ग्रोथ दिखने की पूरी उम्मीद है। हालांकि, असंगठित क्षेत्र और MSMEs की घटती हिस्सेदारी आने वाले समय में रेगुलेटरी नीति में बदलाव का कारण बन सकती है। निवेशकों को सलाह है कि वे त्योहारी सीजन के बाद रिटेल कंपनियों के प्रदर्शन पर बारीकी से नजर रखें, क्योंकि यही तय करेगा कि क्या यह केवल एक ट्रेंड है या बाजार में नए समीकरणों की शुरुआत।
