त्योहारी सीजन में मिठाई बनाना महंगा हो गया है क्योंकि चीनी की कीमतों में सालाना आधार पर **30%** तक की बढ़ोतरी हुई है। रिटेल मार्केट में दाम **₹65 प्रति किलो** तक पहुंच गए हैं, जिससे कन्फेक्शनरी कंपनियां मार्जिन बचाने के लिए 'श्रिंकफ्लेशन' (Shrinkflation) का सहारा ले रही हैं।
त्योहारों के सीजन में मिठाई और कन्फेक्शनरी की भारी मांग होती है, लेकिन इस साल महंगाई ने मिठास कम कर दी है। चीनी के दामों में 30% की भारी बढ़ोतरी का सीधा असर मिठाइयों की लागत पर पड़ा है। बड़े मैन्युफैक्चरर्स से लेकर स्थानीय हलवाइयों तक, हर कोई इस दबाव को झेल रहा है क्योंकि रिटेल में चीनी ₹59.50 से ₹65 प्रति किलो के बीच बिक रही है।
मार्जिन का दबाव और कंपनियों की रणनीति
सिर्फ चीनी ही नहीं, बल्कि डेयरी, ड्राई फ्रूट्स और रिफाइंड ऑयल जैसे जरूरी सामान भी महंगे हुए हैं। अपने मुनाफे को बचाए रखने के लिए कंपनियां अब दो रास्ते अपना रही हैं: या तो सीधे तौर पर मिठाइयों के दाम बढ़ाए जा रहे हैं या फिर 'श्रिंकफ्लेशन' (Shrinkflation) का तरीका अपनाया जा रहा है। इसमें पैकेट का दाम तो वही रहता है, लेकिन उसके अंदर मिठाई का वजन कम कर दिया जाता है। उपभोक्ता कितना इस बदलाव को समझ पाते हैं, यह आने वाले दिनों की बिक्री पर साफ हो जाएगा।
सरकारी दखल और सप्लाई चेन
सरकार ने बाजार को स्थिर करने के लिए स्टॉक लिमिट लगाने और ड्यूटी-फ्री रॉ शुगर इम्पोर्ट की सुविधा को आगे बढ़ाने जैसे कदम उठाए हैं। 31 अक्टूबर 2026 तक 152 शुगर मिल्स काम करना शुरू कर चुकी हैं, जिससे भविष्य में सप्लाई सुधरने की उम्मीद है। हालांकि, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में गन्ने की फसल पर मौसम का असर अभी भी निवेशकों की चिंता का विषय बना हुआ है।
निवेशकों के लिए अहम संकेत
फूड और कन्फेक्शनरी सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों को कंपनियों के मार्जिन पर ध्यान देना चाहिए। आने वाले क्वार्टरली नतीजों में यह देखना जरूरी होगा कि कंपनियां कच्चे माल की महंगाई को कैसे मैनेज कर रही हैं। फूड इन्फ्लेशन का दबाव साल के अंत तक बना रह सकता है, इसलिए कंपनियों की 'प्राइसिंग पावर' और वॉल्यूम ग्रोथ ही उनके शेयरों की चाल तय करेगी।
