De Beers Forevermark भारत में 100 स्टोर खोलेगा, डायमंड की कीमतों में गिरावट और लैब-ग्रोन पत्थरों से मुकाबला

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AuthorMehul Desai|Published at:
De Beers Forevermark भारत में 100 स्टोर खोलेगा, डायमंड की कीमतों में गिरावट और लैब-ग्रोन पत्थरों से मुकाबला

De Beers का ब्रांड Forevermark अगले चार सालों में भारत में **100** रिटेल आउटलेट तक पहुंचने और **$100 मिलियन** का रेवेन्यू हासिल करने की योजना बना रहा है। यह विस्तार ऐसे समय में आया है जब प्राकृतिक हीरे (natural diamonds) के बाजार में कीमतें गिर रही हैं और लैब-ग्रोन (lab-grown) पत्थरों से प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।

डी बीयर्स फॉरएवरमार्क की भारत में बड़ी योजना

डी बीयर्स (De Beers) का लग्जरी ब्रांड फॉरएवरमार्क (Forevermark) भारत में अपने रिटेल फुटप्रिंट का तेजी से विस्तार करने की तैयारी में है। भारत, जो कंपनी का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है, में अगले चार सालों में 100 स्टोर खोलने और $100 मिलियन (लगभग ₹830 करोड़) के सालाना रेवेन्यू का लक्ष्य रखा गया है। यह रणनीति कंपनी के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक प्राकृतिक हीरा उद्योग (natural diamond industry) वर्तमान में कीमतों में गिरावट और सस्ते लैब-ग्रोन (lab-grown) विकल्पों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है।

नए सिरे से ब्रांडिंग पर फोकस

इस विस्तार योजना के तहत, फॉरएवरमार्क अपने बिजनेस मॉडल में बदलाव कर रहा है। अब यह केवल पार्टनर्स पर निर्भर रहने के बजाय अपने खुद के फ्लैगशिप स्टोर (flagship stores) खोलने पर जोर दे रहा है। इसका मकसद डिजाइन और प्रमाणिकता (provenance) पर आधारित अपनी ब्रांड पहचान को मजबूत करना है। कंपनी विशेष रूप से 22 से 43 साल के युवा ग्राहकों को लक्षित कर रही है, जिनके लिए वह आधुनिक, रोजमर्रा के इस्तेमाल लायक ज्वेलरी डिजाइन पेश करेगी। फॉरएवरमार्क के मैनेजिंग डायरेक्टर, मल्लिकाअर्जुन रेड्डी यारबोउलू (Mallikarjuna Reddy Yarabolu) ने हाल ही में बेंगलुरु में एक नए स्टोर के उद्घाटन के मौके पर इस बदलाव पर जोर दिया। कंपनी को उम्मीद है कि सीधे उपभोक्ताओं से जुड़कर वह भारतीय ग्राहकों के साथ एक मजबूत रिश्ता बना पाएगी, जो अन्य वैश्विक बाजारों की तुलना में प्राकृतिक हीरे के आभूषणों के लिए अभी भी एक मजबूत उपभोक्ता आधार बने हुए हैं।

उद्योग पर बढ़ता दबाव

यह रिटेल पुश ऐसे समय में हो रहा है जब प्राकृतिक हीरे का पूरा सेक्टर गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। प्राकृतिक पत्थरों की मांग धीमी पड़ी है और वैश्विक सप्लाई चेन में इन्वेंट्री (inventory) का स्तर ऊंचा बना हुआ है। नतीजतन, डी बीयर्स को कच्चे हीरों (rough diamonds) की कीमतों में कटौती करनी पड़ी है, जिससे प्रति कैरेट औसत बिक्री मूल्य (average realized price per carat) पर सीधा असर पड़ा है। इन मुश्किल हालात के चलते डी बीयर्स के बहुसंख्यक मालिक एंग्लो अमेरिकन (Anglo American) ने अपने डायमंड डिवीजन को बेचने के विकल्पों पर विचार करना शुरू कर दिया है।

लैब-ग्रोन हीरों से कड़ी टक्कर

बाजार में बदलाव लाने वाले प्रमुख कारकों में से एक लैब-ग्रोन हीरों का उदय है। ये विकल्प अपनी काफी कम कीमतों और प्राकृतिक पत्थरों से मिलती-जुलती बनावट के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। यह ट्रेंड खासकर युवा खरीदारों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा पैदा कर रहा है, जो शायद प्राकृतिक हीरे की दुर्लभता (rarity) से जुड़े पारंपरिक मूल्य से ज्यादा सामर्थ्य (affordability) को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि फॉरएवरमार्क प्राकृतिक पत्थरों की प्रामाणिकता और दुर्लभता पर जोर देना जारी रखेगा, लेकिन लैब-ग्रोन सेगमेंट की तीव्र वृद्धि पारंपरिक हीरा उत्पादकों के लिए एक बड़ी बाधा बनी हुई है।

निवेशकों के लिए भविष्य के अहम बिंदु

निवेशक और बाजार विश्लेषक इस बात पर नजर रखेंगे कि फॉरएवरमार्क अपने महंगे रिटेल विस्तार को प्राकृतिक हीरों पर चल रहे मूल्य दबाव के साथ कितनी प्रभावी ढंग से संतुलित कर पाता है। कम कीमत वाले लैब-ग्रोन विकल्पों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए लाभ मार्जिन (profit margins) बनाए रखने की क्षमता महत्वपूर्ण होगी। इसके अलावा, एंग्लो अमेरिकन द्वारा डी बीयर्स के व्यवसाय के संभावित विनिवेश (divestment) की प्रगति पर भी नजर रखी जाएगी, क्योंकि यह इस हीरा दिग्गज के स्वामित्व और भविष्य की रणनीति में बड़े बदलावों का संकेत दे सकता है।

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