इस साल की पहली तिमाही (Q1 FY27) में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर की बिक्री में **21%** का शानदार उछाल आने की उम्मीद है। इसकी सबसे बड़ी वजह है चिलचिलाती गर्मी, जिसने एयर कंडीशनर (AC) की डिमांड को **30%** तक पहुंचा दिया है। हालांकि, कंपनियों को बढ़ती लागत और सप्लाई चेन की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
गर्मी का दिखा कमाल, बिक्री में 21% का उछाल!
इस फाइनेंशियल ईयर की पहली तिमाही में भारतीय कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर जबरदस्त तेजी दिखा रहा है। उम्मीद है कि कुल बिक्री पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 21% बढ़कर ₹461 अरब तक पहुंच जाएगी। इस बूम की सबसे खास वजह है देश भर में पड़ रही कड़ाके की गर्मी, जिसने कूलिंग अप्लायंस (cooling appliance) की डिमांड को आसमान पर पहुंचा दिया है।
AC की तूफानी डिमांड, 30% की बढ़त
खास तौर पर एयर कंडीशनर (AC) इस ग्रोथ के लीडर बने हुए हैं। इनकी डिमांड में 30% का जबरदस्त इजाफा हुआ है। वॉल्यूम (volume) में 18-20% की बढ़ोतरी और 8-10% की प्राइस हाइक (price hike) ने AC की वैल्यू ग्रोथ (value growth) को रफ्तार दी है।
पिछले साल की कम बिक्री का भी फायदा
इस बार की अच्छी बिक्री में पिछले साल की पहली तिमाही (Q1 FY26) का भी योगदान है, जब बेमौसम बरसात की वजह से कूलिंग प्रोडक्ट्स की डिमांड कमजोर रही थी और ग्रोथ सिर्फ 1% थी। इस बार अप्रैल के मध्य से डिमांड में लगातार तेजी देखी गई जो मई तक बनी रही, हालांकि जून में इसमें थोड़ी नरमी आई।
हर सेगमेंट में एक जैसी रफ्तार नहीं
AC और केबल्स-वायर्स (cables and wires) जैसे सेगमेंट 30% से ज्यादा की ग्रोथ दिखा रहे हैं, लेकिन बाकी कैटेगरी में रिकवरी थोड़ी धीमी है। वॉशिंग मशीन और टीवी की बिक्री में भी 5-7% की प्राइस हाइक के सहारे डबल-डिजिट ग्रोथ (double-digit growth) की उम्मीद है। वहीं, रेफ्रिजरेटर सेगमेंट (refrigerator segment) फिलहाल थोड़ा पिछड़ता दिख रहा है।
लागत का बढ़ता बोझ, मार्जिन पर दबाव
सेक्टर के लिए चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भले ही टैक्स के बाद नेट प्रॉफिट (Profit After Tax) में 22% की बढ़कर ₹29 अरब होने की उम्मीद है, लेकिन कंपनियों के मार्जिन (margin) पर दबाव बना हुआ है। ऑपरेटिंग मार्जिन (operating margin) में सिर्फ 10 बेसिस पॉइंट (basis points) की मामूली बढ़त के साथ यह 9.4% रहने का अनुमान है।
इसकी वजह है कॉपर, एल्युमीनियम, रेजिन और पीवीसी (PVC) जैसे रॉ मैटेरियल (raw material) की बढ़ती कीमतें। इसके अलावा, बढ़ते ओशन फ्रेट कॉस्ट (ocean freight cost), इम्पोर्ट (import) में देरी और कमजोर होते रुपये का असर भी लागत पर पड़ रहा है, जिससे इम्पोर्टेड कॉम्पोनेंट्स (imported components) महंगे हो रहे हैं।
निवेशकों को आने वाले दिनों में कंपनियों की लागत प्रबंधन (cost management) पर कड़ी नजर रखनी होगी। यह देखना होगा कि क्या कंपनियां लागत वृद्धि को बिना डिमांड को नुकसान पहुंचाए ग्राहकों पर डाल पाती हैं और सप्लाई चेन की दिक्कतें कब तक दूर होती हैं।
