Bureau of Indian Standards (BIS) ने मिलावटखोरी को रोकने के लिए देश भर में छापेमारी शुरू कर दी है। पुराने आंकड़ों के मुताबिक **18%** फूड सैंपल फेल हो चुके हैं, जिससे अब ग्राहकों का भरोसा स्थानीय दुकानदारों से हटकर बड़ी ब्रांडेड कंपनियों की ओर बढ़ सकता है।
पोर्टेबल लैब्स के जरिए कड़ी निगरानी
त्योहारी सीजन में मिठाई, दूध और खोया जैसी चीजों की मांग में भारी उछाल आता है। इसी को देखते हुए BIS अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि टायर-2 और टायर-3 शहरों में भी पोर्टेबल टेस्टिंग लैब्स तैनात कर रही है। इससे मिलावट का मौके पर ही पता चल रहा है और रिपोर्ट्स के लिए लैब का इंतजार नहीं करना पड़ रहा।
क्यों चिंताजनक हैं आंकड़े?
बीते फाइनेंशियल ईयर में सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कुल 2,23,000 से ज्यादा फूड सैंपल की टेस्टिंग हुई थी, जिनमें से लगभग 18% सैंपल क्वालिटी मानकों पर खरे नहीं उतरे। बिहार जैसे राज्यों में हल्दी में लेड क्रोमेट और मिठाइयों में सिंथेटिक रंगों के मिलने जैसी घटनाओं ने स्वास्थ्य जोखिमों को और बढ़ा दिया है, जिससे सरकार ने अपनी निगरानी सख्त कर दी है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
फूड इंडस्ट्री में यह रेगुलेटरी बदलाव एक बड़े 'स्ट्रक्चरल शिफ्ट' की ओर इशारा करता है। जब छोटे और असंगठित विक्रेताओं पर सरकारी चाबुक चलता है, तो ग्राहक सुरक्षा के लिए ब्रांडेड और पैकेज्ड प्रोडक्ट्स की ओर रुख करते हैं। यह ट्रेंड उन बड़ी FMCG कंपनियों के लिए वरदान साबित हो सकता है जिनका सप्लाई चेन मजबूत है।
हालांकि, निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां छोटे शहरों में अपने छोटे पैक (small-pack) के जरिए कितनी गहराई तक पहुंच बना पाती हैं। नियमों के चलते पूरे सेक्टर की कंप्लायंस कॉस्ट बढ़ सकती है, लेकिन बड़ी कंपनियों की इसे सोखने की क्षमता छोटी इकाइयों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।
