भारत के बड़े कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और अप्लायंस बनाने वाली कंपनियां अब ऑनलाइन और ऑफलाइन रिटेल चैनलों के बीच चल रहे लंबे समय से चले आ रहे 'चैनल कॉन्फ्लिक्ट' को सुलझाने के लिए एक नई रणनीति अपना रही हैं। LG Electronics India, Haier India और Godrej Appliances जैसी कंपनियां अब ऑनलाइन और फिजिकल रिटेल के लिए अलग-अलग स्पेसिफिकेशन्स, वारंटी और डिज़ाइन वाले प्रोडक्ट मॉडल पेश कर रही हैं।
डीलर्स की शिकायतें होंगी दूर
यह नई रणनीति खासकर छोटे शहरों और कस्बों के रिटेल डीलर्स की शिकायतों को दूर करने के लिए बनाई गई है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर अक्सर भारी डिस्काउंट के कारण ऑफलाइन स्टोर्स के मुकाबले कीमतें कम होती हैं, जिससे डीलर्स के लिए बिज़नेस करना मुश्किल हो जाता था। अब कंपनियां इन अलग-अलग मॉडल्स के ज़रिए कीमतों की सीधी तुलना को कम करने की कोशिश कर रही हैं।
ऑनलाइन की बढ़त, ऑफलाइन की ज़रूरत
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि भले ही ऑनलाइन सेल्स, खासकर टीवी और माइक्रोवेव जैसे प्रोडक्ट्स के लिए, अब कुल बिक्री का 40-45% तक पहुंच गई हो, लेकिन फिजिकल डीलर्स सर्विस, कस्टमर एक्सपीरियंस और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए आज भी बेहद ज़रूरी हैं। कंपनियां नहीं चाहतीं कि ऑनलाइन डिस्काउंट उनके ऑफलाइन पार्टनर्स को नाराज़ करें, जो कि ज़्यादा मार्जिन वाले प्रीमियम प्रोडक्ट्स को बेचने में अहम भूमिका निभाते हैं।
क्या हैं कंपनियों की तरकीबें?
- LG Electronics India ने फिजिकल स्टोर्स में बिकने वाले टेलीविज़न के लिए ऑनलाइन मॉडल्स की तुलना में लंबी वारंटी पेश की है।
- Haier India अलग-अलग डिज़ाइन, जैसे कि डोर डिज़ाइन या वॉटर डिस्पेंसर में भिन्नता वाले मॉडल बनाकर ऑनलाइन और ऑफलाइन इन्वेंट्री को अलग रख रहा है।
- Godrej Appliances और Hisense India जैसे ब्रांड्स कैपेसिटी, एनर्जी रेटिंग्स और हार्डवेयर कंपोनेंट्स (जैसे लिड मटीरियल या फिल्ट्रेशन सिस्टम) जैसे फीचर्स में अंतर का इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि शोरूम में बिकने वाला प्रोडक्ट वेबसाइट पर बिकने वाले प्रोडक्ट से बिल्कुल अलग हो।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
यह रणनीति डीलर्स के नेटवर्क को बनाए रखने में मदद कर सकती है, जिससे कंपनियों को ज़्यादा स्थिर रेवेन्यू मिल सकता है। हालांकि, इससे रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) और सप्लाई चेन में जटिलताएं बढ़ सकती हैं, जिससे प्रोडक्शन कॉस्ट में इज़ाफ़ा हो सकता है। निवेशकों को इस बात पर नज़र रखनी होगी कि क्या कंपनियां बढ़ी हुई लागतों को अपने प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाले बिना मैनेज कर पाती हैं।
यह देखना भी अहम होगा कि क्या यह प्रोडक्ट एडजस्टमेंट, रिटेलर्स के साथ चल रही प्राइस वॉर को प्रभावी ढंग से रोक पाता है या नहीं, क्योंकि ऑनलाइन बिक्री का चलन, खासकर बड़े अप्लायंसेस के लिए, लगातार बढ़ रहा है।
