Apollo Pipes को जून 2026 को समाप्त पहली तिमाही में **₹2.5 करोड़** का घाटा हुआ है। पिछले साल इसी अवधि में कंपनी ने **₹12.5 करोड़** का मुनाफा कमाया था। कच्चे माल PVC की कीमतों में आए भारी उतार-चढ़ाव ने कंपनी के प्रदर्शन पर बुरा असर डाला। हालांकि, कंपनी का रेवेन्यू **7.4%** बढ़कर **₹295 करोड़** हो गया, लेकिन प्रॉफिट मार्जिन में बड़ी गिरावट आई और बिक्री की मात्रा में **3%** की कमी दर्ज की गई।
PVC की कीमतों ने कैसे बिगाड़ा मार्जिन?
Apollo Pipes Ltd. ने जून 2026 को समाप्त पहली तिमाही के लिए ₹2.5 करोड़ का नेट लॉस (Net Loss) दर्ज किया है। यह पिछले साल की इसी तिमाही में कंपनी द्वारा कमाए गए ₹12.5 करोड़ के मुनाफे से एक बड़ी गिरावट है। कंपनी का रेवेन्यू पिछले साल के मुकाबले 7.4% बढ़कर ₹295 करोड़ रहा, लेकिन ऑपरेटिंग प्रॉफिटेबिलिटी पर भारी दबाव देखने को मिला।
कंपनी के अनुसार, PVC, जो कि एक मुख्य कच्चा माल है, उसकी कीमतों में हुए तेज उतार-चढ़ाव ने कंपनी के ऑपरेशनल परफॉर्मेंस को बुरी तरह प्रभावित किया। इस वजह से चैनल पार्टनर्स (Channel Partners) ने इन्वेंटरी (Inventory) खरीदना धीमा कर दिया, जिसके चलते बिक्री की मात्रा में 3% की कमी आई और यह 24,477 टन पर आ गई। नतीजतन, ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन गिरकर 1.03% रह गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 7.52% था। एबिटडा (EBITDA) यानी ब्याज, टैक्स और अन्य खर्चों से पहले का मुनाफा 85.3% घटकर ₹3.03 करोड़ हो गया।
ग्रोथ स्ट्रैटेजी और कैपेसिटी एक्सपेंशन
इस तिमाही के नतीजों के बावजूद, मैनेजमेंट अपनी लॉन्ग-टर्म ग्रोथ की योजना पर कायम है। Apollo Pipes अगले दो सालों में अपनी सालाना मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी को 240,000 टन से बढ़ाकर 288,000 टन करने का इरादा रखती है। कंपनी ने बताया कि इस कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) का खर्च इंटरनल कैश जनरेशन (Internal Cash Generation) से किया जाएगा, न कि कोई नया कर्ज लेकर। इसका मकसद कंपनी की बैलेंस शीट को सुरक्षित रखना है। हालांकि, इस विस्तार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनी मध्य, पश्चिमी और पूर्वी भारत के नए बाजारों में अपनी कैपेसिटी यूटिलाइजेशन (Capacity Utilization) को कितना बढ़ा पाती है।
सेक्टर का हाल और निवेशकों के लिए अहम बातें
भारतीय प्लास्टिक पाइपिंग सेक्टर में कमोडिटी की कीमतों में अस्थिरता एक आम चुनौती रही है। जब कच्चे माल की कीमतें अचानक गिरती हैं, तो डिस्ट्रिब्यूटर्स अक्सर अपनी इन्वेंटरी कम करने लगते हैं, जिससे मैन्युफैक्चरर्स के लिए वॉल्यूम में शॉर्ट-टर्म दबाव पैदा होता है। Apollo Pipes के निवेशकों के लिए आने वाली तिमाहियों में सबसे अहम यह देखना होगा कि पॉलीमर की कीमतें कब स्थिर होती हैं और डिस्ट्रिब्यूशन चैनल में इन्वेंटरी का लेवल कब सामान्य होता है। कंपनी अगले तीन सालों में 25% से ज्यादा की रेवेन्यू ग्रोथ का लक्ष्य लेकर चल रही है, इसलिए बाजार लगातार मार्जिन में सुधार और बिक्री की मात्रा में वापसी की उम्मीद करेगा। गुरुवार को NSE पर Apollo Pipes के शेयर 0.95% बढ़कर ₹505 पर बंद हुए, जो तिमाही नतीजों के बजाय कंपनी के लॉन्ग-टर्म एक्सपेंशन लक्ष्यों पर निवेशकों के फोकस को दर्शाता है।
