Amazon Prime Day की शुरुआती बिक्री के आंकड़ों से पता चला है कि इस बार ग्राहकों ने पिछले साल के मुकाबले औसतन **16%** कम खर्च किया है। ग्राहक भारी छूट की तलाश में हैं, वहीं कई ब्रांड्स अपनी बढ़ती लागत के कारण ऐसी छूट देने में संघर्ष कर रहे हैं। यह रिटेलर्स के लिए मुनाफा बनाए रखने की चुनौती खड़ी कर रहा है।
क्या हुआ?
Amazon Prime Day की सालाना सेल की शुरुआत हुई है, लेकिन इस बार ग्राहकों के खर्च में साफ तौर पर कमी देखी जा रही है। रिसर्च फर्म Numerator के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, इस सेल इवेंट के दौरान प्रति परिवार औसत खर्च 2025 की तुलना में 16% घट गया है। ग्राहक अभी भी खरीदारी कर रहे हैं, लेकिन वे ज़्यादा चुनिंदा हो गए हैं और कीमत के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं। बहुत से लोग कोई भी खरीदारी करने से पहले बड़े डिस्काउंट का इंतज़ार कर रहे हैं।
डिस्काउंट्स पर ज़ोर-आज़माइश
ग्राहकों की मांग और ब्रांड्स की क्षमता के बीच एक बड़ी खाई बनती दिख रही है। भारी छूट की मांग ज़ोरों पर है। मार्केटिंग एजेंसी Tinuiti के सर्वे बताते हैं कि ज़्यादातर खरीदार कम से कम 30% की छूट चाहते हैं, और हर पांच में से एक ग्राहक 50% या उससे ज़्यादा की छूट का इंतज़ार कर रहा है। इसकी मुख्य वजह लगातार बढ़ती महंगाई और ईंधन की ऊंची कीमतें हैं, जिन्होंने लोगों के बजट को टाइट कर दिया है।
लेकिन, ब्रांड्स और छोटे व्यापारियों के लिए इन मांगों को पूरा करना मुश्किल हो रहा है। कई कंपनियों को कच्चे माल और सप्लाई चेन की बढ़ती लागत का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में, 30% से 50% तक की भारी छूट देना अक्सर मुनाफे को कम कर देता है। Spreetail जैसी कंपनियों के विक्रेता 15% से 20% तक की छूट देकर ही अपनी लागत संभाल पा रहे हैं, जिससे कुछ ग्राहक सस्ते विकल्प तलाश रहे हैं।
Amazon का पक्ष
Amazon इस बिक्री के कमजोर शुरुआत की कहानी को खारिज कर रहा है। कंपनी ने कहा है कि तीसरे पक्ष के डेटा से कभी-कभी बिक्री की असल स्थिति का सही अंदाज़ा नहीं लग पाता, खासकर जब इतने सारे डील्स उपलब्ध हों। Amazon का कहना है कि वे ग्राहकों की शुरुआती भागीदारी से संतुष्ट हैं और उन्होंने साल के सबसे कम दाम पर एक मिलियन से ज़्यादा आइटम्स ऑफर किए हैं, जिनमें से कई पर 40% से ज़्यादा की छूट है।
निवेशकों के लिए क्यों ज़रूरी?
निवेशकों के लिए, यह ट्रेंड रिटेल सेक्टर की एक बड़ी चुनौती को उजागर करता है: 'मार्जिन बनाम वॉल्यूम' की दुविधा। जब ग्राहक कीमत को लेकर सतर्क हों और ब्रांड्स की लागत बढ़ रही हो, तो कंपनियों को मुश्किल फैसला लेना पड़ता है। अगर वे ग्राहकों को बनाए रखने के लिए कीमतें कम करते हैं, तो उनका मुनाफा कम हो सकता है। अगर वे कीमतें बढ़ाते हैं, तो वे बिक्री खोने का जोखिम उठाते हैं।
हालांकि Adobe Analytics जैसे उद्योग पर्यवेक्षक अभी भी इस इवेंट में ई-कॉमर्स सेक्टर में कुल खर्च 9% बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन ग्राहकों का यह व्यवहार (AI टूल्स से कीमतों की तुलना करना और बड़े डिस्काउंट खोजना) बताता है कि बाज़ार में कड़ी प्रतिस्पर्धा है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
रिटेल और ई-कॉमर्स स्पेस पर नज़र रखने वाले निवेशक आने वाले तिमाही नतीजों में कंपनियों के प्रदर्शन पर ध्यान दे सकते हैं। मुख्य बिंदु यह होगा कि क्या ब्रांड्स प्रमोशनल खर्चों को मैनेज करते हुए अपने मुनाफे को बनाए रख पाते हैं, बढ़ती लागतों का बॉटम-लाइन पर क्या असर होता है, और क्या कम लागत वाले या वैल्यू-ओरिएंटेड विकल्पों की ओर झुकाव जारी रहता है। फोकस इस बात पर रहेगा कि क्या रिटेलर्स सिर्फ आक्रामक डिस्काउंटिंग पर निर्भर हुए बिना ग्रोथ बनाए रख सकते हैं।
