ग्लोबल मार्केट में कच्चा तेल **$70** प्रति बैरल के नीचे आ गया है, लेकिन भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम जस के तस बने हुए हैं। ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) पिछले नुकसान की भरपाई कर रही हैं, वहीं सरकार भी एक्साइज ड्यूटी घटाने से हिचकिचा रही है।
क्या हुआ है?
दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई है और यह $70 प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहा है। यह भाव पहले के $120 प्रति बैरल के स्तर से काफी कम है। माना जा रहा है कि पश्चिम एशिया में जियो-पॉलिटिकल तनाव में कमी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम व्यापारिक मार्गों के खुलने से कीमतों में यह नरमी आई है।
इसके बावजूद, भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई कमी नहीं आई है। इससे आम ग्राहकों और निवेशकों के लिए एक सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर ग्लोबल मार्केट की नरमी का फायदा उन्हें क्यों नहीं मिल रहा है। दरअसल, भारत में फ्यूल की कीमतें सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) और सरकार की टैक्सेशन पॉलिसी पर ज्यादा निर्भर करती हैं।
ऑयल कंपनियों की वित्तीय स्थिति
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां कीमतों को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। इन कंपनियों ने पिछले कुछ समय में ऊंचे दाम पर फ्यूल बेचने की वजह से लगभग ₹74,781 करोड़ का भारी घाटा झेला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन कंपनियों को अपना घाटा पूरा करने के लिए कच्चे तेल की कीमतों को $75 प्रति बैरल के आसपास 6 से 12 महीनों तक स्थिर रहने की जरूरत है। जब तक इन कंपनियों की बैलेंस शीट ठीक नहीं हो जाती, तब तक वे खुदरा कीमतों में कटौती करने के दबाव में नहीं हैं।
सरकार का रेवेन्यू और फिस्कल प्लान
OMCs की प्रॉफिटेबिलिटी के अलावा, सरकार की अपनी वित्तीय स्थिति भी एक बड़ा फैक्टर है। पिछले कुछ सालों में, केंद्र सरकार ने ग्राहकों को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) घटाई थी, जिससे सरकार के रेवेन्यू को काफी नुकसान हुआ था।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सरकार संभवतः खुदरा कीमतों में कटौती करने से पहले इन एक्साइज ड्यूटी लेवल्स को फिर से बहाल करना चाहेगी। इसके अलावा, सरकार को अपने कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) और फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) के लक्ष्यों को भी साधना है, इसलिए फ्यूल पर टैक्स कलेक्शन को स्थिर रखना उसके लिए जरूरी है।
इन्वेंटरी और जियो-पॉलिटिकल फैक्टर
खुदरा कीमतों पर इस बात का भी असर पड़ता है कि कंपनियां कच्चे तेल की खरीद कब करती हैं। रिफाइनरियां फिलहाल उस कच्चे तेल को प्रोसेस कर रही हैं जिसे उन्होंने हालिया जियो-पॉलिटिकल तनाव के दौरान ऊंचे दामों पर खरीदा था। सस्ते तेल का फायदा तब तक घरेलू बाजार तक नहीं पहुंचेगा जब तक इन पुराने, महंगे स्टॉक का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं हो जाता और रिफाइनरियां नई, सस्ती खेप को प्रोसेस करना शुरू नहीं कर देतीं।
साथ ही, सरकार पश्चिम एशिया में मौजूदा शांति की स्थिरता पर भी नजर रखे हुए है। अगर कीमतों में कोई भी उतार-चढ़ाव आता है, तो कीमतों में की गई कटौती को बाद में बढ़ाना मुश्किल हो सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
तेल और गैस सेक्टर के निवेशकों को कच्चे तेल की कीमतों के स्थिर स्तर और OMCs द्वारा अपने नुकसान की भरपाई की रफ्तार पर नजर रखनी चाहिए। इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल के तिमाही नतीजों से पता चलेगा कि ये कंपनियां कितनी तेजी से घाटे से उबर रही हैं। इसके अलावा, सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में किसी भी बदलाव की घोषणा पर भी नजर रखनी होगी, जो 2026 के उत्तरार्ध में खुदरा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संभावित बदलावों का संकेत दे सकती है।
