प्रोडक्शन में भारी गिरावट
खबरों के मुताबिक, वेस्ट एशिया में छिड़े संघर्ष के कारण भारतीय एल्युमीनियम एक्सट्रूज़न इंडस्ट्री का प्रोडक्शन बुरी तरह गिर गया है। जहां पहले सालाना 12 से 13 लाख टन एल्युमीनियम का उत्पादन होता था, वहीं अब यह घटकर हर महीने 50,000 से 60,000 टन के बीच रह गया है। यह लगभग 40% से 50% की भारी गिरावट है।
लागत में इजाफा और क्षमता का कम इस्तेमाल
इस संकट ने सेक्टर के लगभग 50% कच्चे माल के आयात को बुरी तरह प्रभावित किया है, जो इस क्षेत्र से आता है। इसके चलते प्रोडक्शन में रुकावटें आई हैं। ऊर्जा की कीमतों में आई तेजी और LPG/PNG की कमी की वजह से कन्वर्जन कॉस्ट में 25% का इजाफा हुआ है। नतीजतन, भारत के 100 से 125 एक्सट्रूज़न प्लांट्स में से कई अपनी 42 लाख टन की कुल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी का मात्र 30% से 40% ही इस्तेमाल कर पा रहे हैं।
ग्लोबल दाम में तेज़ी, बढ़ता भाड़ा
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की बात करें तो, 7 अप्रैल 2026 को एल्युमीनियम की कीमतें $3,462.90 प्रति टन के आसपास कारोबार कर रही थीं, जो पिछले साल के मुकाबले 48.01% की बड़ी बढ़ोतरी दिखाती हैं। इसके अलावा, शिपिंग रूट्स में आई गड़बड़ियों के कारण भाड़े (Freight) का खर्च भी बढ़ गया है, जिसने भारतीय निर्माताओं पर दबाव और बढ़ा दिया है।
स्ट्रक्चरल कमजोरियां उजागर
यह मौजूदा संकट भारत के एल्युमीनियम एक्सट्रूज़न सेक्टर की गहरी संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करता है, खासकर कच्चे माल और ऊर्जा के लिए वेस्ट एशिया पर इसकी निर्भरता। भले ही वैश्विक स्तर पर सप्लाई की चिंताओं के कारण एल्युमीनियम की कीमतें बढ़ रही हों, लेकिन भारत की स्थिति आयात पर उसकी विशिष्ट निर्भरता के कारण और भी गंभीर हो गई है।
MSMEs पर मंडराता खतरा, राहत की मांग
यह सेक्टर, जिसमें ALEMAI के 90% सदस्य छोटे और मध्यम उद्यम (MSMEs) हैं, इन झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील है। बढ़ती इनपुट कॉस्ट और सप्लाई में रुकावटें इन कंपनियों की लिक्विडिटी (Liquidity) और कर्ज़ चुकाने की क्षमता पर खतरा पैदा कर रही हैं। खबरें ऐसी भी हैं कि कुछ प्लांट्स बंद हो गए हैं और बड़े पैमाने पर नौकरियां ख़त्म हो रही हैं। इंडस्ट्री बॉडी ALEMAI ने तत्काल वित्तीय राहत की मांग की है, जिसमें लोन मोरेटोरियम (Loan Moratorium) और ब्याज भुगतान में देरी जैसे कदम शामिल हैं, जैसा कि कोविड-19 महामारी के दौरान किया गया था। यह स्थिति डिफॉल्ट (Default) का कारण बन सकती है।
सरकारी निगरानी और भविष्य की राह
इस मामले पर भारत सरकार की नज़र है। वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री, जितेन प्रसाद (Jitin Prasada) ने वेस्ट एशिया संकट के वैश्विक आर्थिक प्रभाव को स्वीकार किया है और आश्वासन दिया है कि अंतर-मंत्रालयी चर्चाएं (Inter-ministerial discussions) चल रही हैं। सरकार ने मध्य पूर्व में तनाव के बीच सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी समूह का गठन किया है, जो ट्रेड लॉजिस्टिक्स (Trade Logistics) की निगरानी करेगा और एक्सपोर्टर्स (Exporters) व इंपोर्टर्स (Importers) को प्रोसीजरल फ्लेक्सिबिलिटी (Procedural Flexibility) प्रदान करेगा।
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि मध्य पूर्व में सप्लाई बाधित होने की चिंताओं के चलते एल्युमीनियम की वैश्विक कीमतें बढ़ती रहेंगी, और कुछ अनुमानों के अनुसार ये $4,000 USD प्रति टन तक पहुंच सकती हैं। भारतीय एल्युमीनियम एक्सट्रूज़न सेक्टर के लिए आगे का रास्ता यह है कि वह तत्काल संकटों से निपटे और साथ ही आयात पर निर्भरता कम करने, घरेलू सोर्सिंग बढ़ाने तथा स्थायी ऊर्जा समाधानों के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा जैसे दीर्घकालिक संरचनात्मक मुद्दों को भी संबोधित करे।