भू-राजनीतिक वजहें
पश्चिम एशिया में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में यह तूफानी तेजी आई है। Brent क्रूड 26.4% चढ़कर $117.16 प्रति बैरल पर जा पहुंचा है। इस इलाके के अहम जलमार्ग, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सप्लाई बाधित होने का डर बढ़ गया है। इराक, कुवैत और कतर जैसे तेल उत्पादक देशों द्वारा उत्पादन घटाने की खबरों ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। हाल ही में बेरूत में ईरानी कमांडरों पर इज़राइल के हमले की खबरों ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है, जिससे एक बड़े युद्ध की आशंका गहरा गई है।
भारत पर आर्थिक असर
दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक देश भारत के लिए तेल की कीमतों में यह उछाल एक बड़ी आर्थिक चुनौती है। कच्चे तेल के महंगे होने का सीधा मतलब है कि भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे देश के राजकोषीय संतुलन (fiscal balance) पर दबाव पड़ेगा और भारतीय रुपया (Indian Rupee) कमजोर होगा। इन सब वजहों से महंगाई (inflation) बढ़ने की पूरी आशंका है, जिससे आम उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिए चीजें महंगी हो जाएंगी। बढ़ती महंगाई की वजह से वैश्विक ब्याज दरों (interest rates) पर भी दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर निवेश पर पड़ सकता है।
निवेशकों की घबराहट और विदेशी निवेश
वैश्विक शेयर बाजारों में भी इस खबर का असर साफ दिख रहा है। एशियाई शेयर 4.8% तक गिर गए, जबकि वॉल स्ट्रीट (Wall Street) और यूरोप के लिए फ्यूचर्स (futures) भी स्लाइड कर रहे हैं। भारतीय इक्विटी (equities) में भी भारी गिरावट की उम्मीद है, क्योंकि GIFT Nifty फ्यूचर्स ने 2.8% की गिरावट का संकेत दिया है। पिछले हफ्ते Nifty 50 और Sensex अपने सबसे खराब साप्ताहिक प्रदर्शन में से एक देख चुके थे, दोनों में करीब 2.9% की गिरावट आई थी। 'पश्चिम एशिया के बढ़ते तनाव ने निवेशकों के सेंटीमेंट को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे सभी सेक्टरों में बिकवाली और जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (risk aversion) देखने की संभावना है,' कहते हैं स्वास्तिका इन्वेस्टमार्ट के सीनियर टेक्निकल एनालिस्ट प्रवीण गौर। विदेशी निवेशकों (foreign investors) की लगातार बिकवाली, जिन्होंने शुक्रवार को ₹60.30 अरब के शेयर बेचे, भारतीय बाजारों पर दबाव और बढ़ा रही है।