भारत के लिए यूरिया के दाम **15 महीने** के निचले स्तर **$392** प्रति टन पर आ गए हैं, लेकिन राहत पूरी नहीं है। फाइनेंशियल ईयर **2026-27** के लिए तय **₹2.17 लाख करोड़** के फर्टिलाइजर सब्सिडी बजट के **₹25,000 करोड़** से ज्यादा ओवरशूट होने के आसार हैं, जिसकी बड़ी वजह DAP की महंगी कीमतें हैं।
भारत में सितंबर के महीने में यूरिया आयात की लागत गिरकर $392 प्रति टन के 15 महीने के निचले स्तर पर आ गई है। याद दिला दें कि मई में यह कीमत $947 प्रति टन के पीक पर थी। सरकार ने ओमान, मलेशिया और रूस जैसे देशों से सप्लाई बढ़ाकर घरेलू स्टॉक को बेहतर बनाया है, जिससे रबी सीजन की मांग पूरी होने की उम्मीद है।
सब्सिडी का गणित और चुनौतियां
यूरिया में राहत के बावजूद सरकारी खजाने पर दबाव बरकरार है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए ₹2.17 लाख करोड़ का बजट आवंटित किया गया था, लेकिन मौजूदा अनुमानों के मुताबिक इसमें ₹20,000 करोड़ से ₹25,000 करोड़ तक की अतिरिक्त सब्सिडी खर्च हो सकती है। हालांकि यह आंकड़ा पिछले अनुमानों से कम है, लेकिन ग्लोबल मार्केट में अस्थिरता चिंता का विषय बनी हुई है।
क्यों महंगी पड़ रही है DAP?
बजट बिगड़ने की मुख्य वजह DAP (Diammonium Phosphate) की कीमतें हैं। यूरिया के उलट DAP की कीमत अभी भी $906 प्रति टन के आसपास बनी हुई है। इसका बड़ा कारण सल्फर की कीमतों में आया 200% से ज्यादा का उछाल है, जो अब $1,000 प्रति टन के पार निकल चुका है।
जियोपॉलिटिकल तनाव और सप्लाई चेन
पश्चिम एशिया में अस्थिरता और रूस में एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को हुए नुकसान के चलते फास्फोरिक एसिड और सल्फर की सप्लाई प्रभावित हुई है। इन ग्लोबल फैक्टर्स के कारण रॉ मटेरियल महंगा हो गया है, जिसका सीधा असर सरकार के सब्सिडी खर्च और फर्टिलाइजर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ रहा है।
निवेशकों के लिए संकेत
फर्टिलाइजर सेक्टर के निवेशकों के लिए यह स्थिति मिली-जुली है। जहां यूरिया की घटती लागत सकारात्मक है, वहीं सब्सिडी का बोझ बढ़ने से कंपनियों के पेमेंट में देरी का डर बना रहता है। निवेशकों को सरकार के अगले कदमों और इनपुट कॉस्ट के असर पर कड़ी नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि बढ़ती रॉ मटेरियल कॉस्ट कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को सीधे प्रभावित करती है।
