Urad Price: सप्लाई की तंगी और बुवाई पर संकट, उड़द के दाम **20%** चढ़े

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AuthorAditya Rao|Published at:
Urad Price: सप्लाई की तंगी और बुवाई पर संकट, उड़द के दाम **20%** चढ़े

पिछले एक महीने में घरेलू उत्पादन कम होने और अहम निर्यात बाज़ारों में सप्लाई की दिक्कतों के चलते थोक उड़द की कीमतें करीब **20%** बढ़ गई हैं। कीमतों में यह उछाल मांग-आपूर्ति के बीच बढ़ती खाई और बारिश के पैटर्न से प्रभावित खरीफ बुवाई को लेकर अनिश्चितता को दर्शाता है। निवेशकों को यह देखना होगा कि खाद्य महंगाई के इन रुझानों का FMCG कंपनियों के मार्जिन और सरकार की भविष्य की इंपोर्ट पॉलिसी पर क्या असर पड़ता है।

घरेलू बुवाई और उत्पादन की चुनौतियाँ

घरेलू सप्लाई की स्थिति टाइट बनी हुई है, जो 2025-26 सीजन में उत्पादन में आई गिरावट के बाद और भी खराब हो गई है। इस साल उत्पादन घटकर 21.60 लाख टन रह गया, जो पिछले साल 22.42 लाख टन था। 17 जुलाई तक खरीफ सीजन के लिए जो आंकड़े आए हैं, उनमें उड़द की बुवाई 13.51 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 6% कम है। बुवाई रकबे में इस कमी और आंध्र प्रदेश की रबी फसल में 15-20% तक उपज के नुकसान ने उपलब्ध स्टॉक को खत्म कर दिया है। बाजार के जानकारों का कहना है कि पिछली रबी सप्लाई को उत्तरी राज्यों ने जल्दी खपा लिया, जिससे मौजूदा स्टॉक में ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है।

वैश्विक सप्लाई का दबाव और इंपोर्ट महंगा

भारत ही नहीं, म्यांमार और ब्राजील जैसे बड़े उत्पादक देश भी खराब मौसम और बीमारियों के कारण कम पैदावार की रिपोर्ट कर रहे हैं। ट्रेड रिपोर्ट्स के अनुसार, म्यांमार का उत्पादन उसके सामान्य 10 लाख टन से घटकर 7 लाख टन तक रह सकता है, जिसका एक कारण येलो मोजेक वायरस भी है। नतीजतन, इंपोर्टेड उड़द की लागत काफी बढ़ गई है। चेन्नई में म्यांमार से अच्छी क्वालिटी के ब्लैक मैटपे (उड़द) का इंपोर्ट प्राइस एक महीने पहले $825 प्रति टन था, जो अब बढ़कर $935 प्रति टन हो गया है। वहीं, बेहतर क्वालिटी के लिए कीमतें $905 से बढ़कर $1,030 प्रति टन हो गई हैं। भारतीय रुपए के कमजोर होने से स्थिति और बिगड़ गई है, जिससे घरेलू व्यापारियों के लिए इन जरूरी इंपोर्ट की लागत प्रभावी रूप से बढ़ गई है।

बाजार की भावना पर असर

ट्रेडर्स सतर्क रुख अपनाए हुए हैं, कई लोगों ने पिछले वित्तीय नुकसान के कारण बड़ी मात्रा में स्टॉक जमा करने से परहेज किया है। अल नीनो (El Nino) घटना चर्चा का विषय रही है, लेकिन इससे अभी तक सट्टा आधारित स्टॉक होल्डिंग नहीं हुई है। निवेशकों के लिए, सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन बढ़ती लागतों का खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) और FMCG कंपनियों के मार्जिन पर क्या असर पड़ेगा। यदि दालें महंगी बनी रहीं, तो कंपनियों पर या तो इनपुट लागत को खुद झेलने या उपभोक्ताओं पर बोझ डालने का दबाव होगा, जो कुल मांग को प्रभावित कर सकता है। बाजार के लिए अगली महत्वपूर्ण अपडेट्स बारिश की प्रगति और खरीफ बुवाई के आंकड़ों की होंगी, साथ ही खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति (Food Price Inflation) को नियंत्रित करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप, जैसे इंपोर्ट ड्यूटी में बदलाव या स्टॉक लिमिट लगाने की कोई भी संभावना भी महत्वपूर्ण होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.